भारत के **70%** बैंकों ने AI टूल्स का इस्तेमाल तो शुरू कर दिया है, लेकिन डेटा सिक्योरिटी और गवर्नेंस की चिंताओं के कारण इसका बड़े स्तर पर विस्तार नहीं हो पा रहा है। RBI की सख्ती के बीच बैंक अपनी नई टेक-बजट का **10%** से भी कम हिस्सा AI पर खर्च कर रहे हैं।
चुनौती का असली कारण क्या है?
भारतीय बैंकिंग सेक्टर डिजिटल बदलाव के एक ऐसे मोड़ पर है, जहां AI का उत्साह हकीकत की जमीन पर टकरा रहा है। 2026 Zeta CXO सर्वे की रिपोर्ट बताती है कि भले ही 70% बैंक AI का उपयोग कर रहे हैं, लेकिन इसका दायरा अभी भी छोटे टास्क तक ही सीमित है। अधिकांश बैंक अभी केवल फ्रॉड डिटेक्शन, कस्टमर सर्विस और डॉक्यूमेंट प्रोसेसिंग जैसे सीमित कामों में ही AI का इस्तेमाल कर पा रहे हैं।
क्यों नहीं हो पा रहा बड़ा विस्तार?
बड़े पैमाने पर AI को लागू करने में सबसे बड़ी बाधा 'डेटा साइलो' है। लगभग 50% संस्थान मान रहे हैं कि उनका डेटा अलग-अलग सिस्टम में फंसा हुआ है, जिससे AI मॉडल्स के लिए जरूरी सूचनाओं का प्रवाह बाधित हो रहा है। इसके अलावा, डेटा लेबलिंग और प्राइवेसी कंसेंट की मुश्किलों ने बैंकों को सतर्क कर दिया है। यही वजह है कि नई टेक्नोलॉजी के बजट का 10% से भी कम हिस्सा AI की ओर मोड़ा जा रहा है।
RBI की चेतावनी और 'ब्लैक-बॉक्स' का डर
Reserve Bank of India ने साफ कर दिया है कि AI का उपयोग एक स्ट्रैटेजिक प्राथमिकता होनी चाहिए। रेगुलेटर ने 'ब्लैक-बॉक्स' निर्णय लेने की प्रक्रिया यानी AI द्वारा बिना स्पष्ट तर्क के रिजल्ट देने पर चिंता जताई है। इसके साथ ही, लेंडिंग में होने वाले भेदभाव और थर्ड-पार्टी टेक्नोलॉजी प्रोवाइडर्स पर जरूरत से ज्यादा निर्भरता पर भी सख्त रुख अपनाया गया है।
फिलहाल, कोई भी बैंक पूरे संगठन के लिए एक व्यापक AI पॉलिसी तैयार नहीं कर पाया है। निवेशकों के लिए नजर रखना जरूरी होगा कि बैंक अपनी डेटा आर्किटेक्चर को कितना आधुनिक बना पाते हैं, क्योंकि यही भविष्य की प्रॉफिटेबिलिटी का आधार तय करेगा।
