Indian Banks: मुनाफा बचाने के लिए बैंकों का नया दांव! जमा दरों में कटौती रोकी

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AuthorSaanvi Reddy|Published at:
Indian Banks: मुनाफा बचाने के लिए बैंकों का नया दांव! जमा दरों में कटौती रोकी
Overview

Indian Banks अपने प्रॉफिट मार्जिन को बचाने के लिए मौजूदा जमाओं (Deposits) पर ब्याज दरों में कटौती करने में देरी कर रहे हैं। यह रणनीति, मजबूत लोन डिमांड और बैंकिंग सिस्टम में कसती जा रही लिक्विडिटी के बीच बैंकों को फंडिग कॉस्ट (Funding Cost) को ऊंचा रखने और अपने मुनाफे को स्थिर रखने में मदद कर रही है।

क्यों हो रही है देरी?

भारतीय बैंकों ने अपनी मौजूदा टर्म डिपॉजिट (Term Deposits) पर ब्याज दरों को फिर से एडजस्ट करने में एक सतर्क रुख अपनाया है। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) द्वारा जनवरी 2025 से जनवरी 2026 के बीच रेपो रेट (Repo Rate) में कुल 125 बेसिस पॉइंट की कटौती के बावजूद, बैंकों में पड़ी कुल जमाओं (Outstanding Deposit Rates) पर ब्याज दरें महज़ 42 बेसिस पॉइंट ही कम हुई हैं।

इसके विपरीत, नई जमाओं (Fresh Deposit Rates) पर ब्याज दरों में लगभग 99 बेसिस पॉइंट का एडजस्टमेंट देखा गया है, जो दर कटौती का लगभग 79% है। यह चाल बैंकों को मुनाफा बनाए रखने में मदद कर रही है, क्योंकि लोन की मांग (Loan Demand) जमा वृद्धि (Deposit Growth) से कहीं आगे निकल गई है। फरवरी 2026 तक, क्रेडिट ग्रोथ सालाना 14.9% थी, जबकि डिपॉजिट ग्रोथ लगभग 12.5% पर रही। इस स्थिति ने क्रेडिट-टू-डिपॉजिट रेश्यो (Credit-to-Deposit Ratio) को 80% से ऊपर धकेल दिया है।

सिस्टम में लिक्विडिटी का कसाव

यह स्ट्रेटेजिक डिपॉजिट रिटेंशन (Strategic Deposit Retention) तब हो रहा है जब बैंकिंग सिस्टम लिक्विडिटी (Liquidity) के कसने का सामना कर रहा है। मार्च 2026 में भारतीय बैंकिंग सिस्टम लगभग ₹65,900 करोड़ के डेफिसिट (Deficit) में था, जो कि टैक्स के बड़े आउटफ्लो (Tax Outflows) और RBI के करेंसी इंटरवेंशन (Currency Interventions) के कारण साल की शुरुआत में आरामदायक सरप्लस (Surplus) से एक बड़ा बदलाव था। इस कमी ने डिपॉजिट्स के लिए प्रतिस्पर्धा को बढ़ा दिया है, जिससे बैंकों को फंडिग कॉस्ट ऊंचा रखने के लिए प्रोत्साहन मिला है।

Nomura के एनालिस्ट्स (Analysts) चेतावनी देते हैं कि इस लिक्विडिटी क्रंच (Liquidity Crunch) से प्रेरित क्रेडिट ग्रोथ, मार्जिन पर दबाव डाल सकती है। उनका अनुमान है कि अगर डिपॉजिट ग्रोथ कमजोर बनी रहती है, तो फाइनेंशियल ईयर 27 (FY27) में प्रॉफिट मार्जिन में गिरावट आ सकती है। SBI के पास Q3 FY26 तक डिपॉजिट मार्केट शेयर का लगभग 22% और एडवांसेस (Advances) का 20% था।

आगे क्या?

बैंक मार्जिन को मैनेज करने में माहिर हैं, लेकिन जोखिम बढ़ रहे हैं। डिपॉजिट रेट कट में देरी से अल्पकालिक मुनाफे को मदद मिलती है, लेकिन अगर डिपॉजिट ग्रोथ क्रेडिट डिमांड को पूरा नहीं कर पाती है तो यह एक समस्या बन सकती है। प्राइवेट बैंकों को अधिक दबाव का सामना करना पड़ सकता है क्योंकि उनके लोन अक्सर बाहरी दरों के मुकाबले डिपॉजिट्स की तुलना में तेजी से एडजस्ट होते हैं। यह अंतर प्राइवेट बैंकों के लिए अधिक महत्वपूर्ण प्रॉफिट मार्जिन दबाव का कारण बन सकता है यदि वे किफायती रूप से डिपॉजिट्स को आकर्षित करने या बनाए रखने के लिए संघर्ष करते हैं।

एनालिस्ट्स का अनुमान है कि बैंकिंग सेक्टर में प्रॉफिट मार्जिन में कोई बड़ा सुधार FY26 के अंत या FY27 की शुरुआत तक नहीं दिखेगा। बैंक लोन पोर्टफोलियो को हाई-यील्डिंग एरिया (Higher-yielding areas) में शिफ्ट करके, फी इनकम (Fee Income) बढ़ाकर और ऑपरेशनल कॉस्ट (Operational Costs) में कटौती करके मार्जिन की रक्षा करने के लिए काम कर रहे हैं। RBI की मॉनेटरी पॉलिसी कमेटी (Monetary Policy Committee) के फिलहाल ब्याज दरों को स्थिर रखने की उम्मीद है।

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