संपत्ति की गुणवत्ता में ऐतिहासिक सुधार
भारतीय शेड्यूल्ड कमर्शियल बैंकों ने अपनी एसेट क्वालिटी में ऐतिहासिक सुधार दिखाया है। दिसंबर 2025 तक ग्रॉस नॉन-परफॉर्मिंग एसेट्स (NPAs) का अनुपात घटकर महज 2% रह गया है, जो एक साल पहले 2.5% था। यह लगातार तीसरे साल की रिकवरी और समाधान का नतीजा है। रिटेल लोन, सर्विसेज, इंडस्ट्री और एग्रीकल्चर जैसे सभी प्रमुख सेक्टर्स में NPAs में कमी आई है, जो क्रमशः 1%, 1.7%, 1.8% और 5.7% पर आ गए हैं। यह 2% का NPA लेवल भारतीय बैंकिंग सेक्टर के लिए एक बड़ी उपलब्धि है।
क्रेडिट ग्रोथ में तेज़ी, विदेशी बैंक आगे
क्रेडिट ग्रोथ के मोर्चे पर विदेशी बैंकों ने 14.7% की दर से सबसे ज़्यादा तेज़ी दिखाई है। प्राइवेट और पब्लिक सेक्टर के बैंकों ने भी इस दौड़ में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। कुल मिलाकर, एडजस्टेड नॉन-फूड क्रेडिट में Q4FY26 में सालाना 13.5% की ज़बरदस्त बढ़त देखी गई, जो पिछले साल 10.8% थी।
RBI का आश्वासन: चिंता की कोई बात नहीं
भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और सप्लाई चेन में रुकावटों जैसी वैश्विक अनिश्चितताओं के बारे में बात की। उन्होंने साफ किया कि भारतीय बैंकिंग सिस्टम की प्रॉफिटेबिलिटी और हेल्थ अभी भी बेहद मज़बूत है और इन बाहरी कारकों से किसी भी तरह के बड़े सिस्टमैटिक रिस्क का कोई संकेत नहीं है। RBI की दिसंबर 2025 की मॉनेटरी पॉलिसी रिपोर्ट में भी मज़बूत क्रेडिट ग्रोथ और डोमेस्टिक डिमांड की बात कही गई थी।
आगे क्या, क्या हैं जोखिम?
भले ही NPA कम हुए हों, लेकिन कुछ संभावित चिंताएं बनी हुई हैं। एसेट क्वालिटी में सुधार कितना टिकाऊ होगा, यह लगातार रिकवरी, एसेट अपग्रेड और राइट-ऑफ पर निर्भर करेगा। अगर भविष्य में आर्थिक हालात बिगड़ते हैं, तो इन 'सुधरे हुए' एसेट्स की क्वालिटी पर सवाल उठ सकता है।
इसके अलावा, भले ही क्रेडिट ग्रोथ तेज़ हो, लेकिन नए लोन की क्वालिटी पर भी नज़र रखनी होगी। कुछ विश्लेषकों का मानना है कि वैश्विक अनिश्चितताओं और कुछ खास सेक्टर्स में तनाव की आशंका के चलते आगे का नज़रिया थोड़ा संभलकर देखने वाला है। RBI भले ही अभी कोई बड़ा खतरा न देख रहा हो, लेकिन बाजार की पैनी नज़र इस बात पर रहेगी कि बैंक इन जोखिमों का प्रबंधन कैसे करते हैं।