फाइनेंशियल ईयर 2025 (FY25) में भारतीय बैंकों ने नई भर्तियां लगभग 80% तक घटा दी हैं। इस दौरान इंडस्ट्री में सिर्फ 21,000 नई नौकरियां आईं। जहाँ सरकारी बैंक स्टाफ बढ़ा रहे हैं, वहीं बड़े प्राइवेट बैंक अपनी टीम कम कर रहे हैं, जो डिजिटल ऑटोमेशन और AI की ओर बढ़ते कदम का इशारा है।
Detailed Coverage
बैंकों में नई भर्तियों का सूखा: 80% की गिरावट
फाइनेंशियल ईयर 2024-25 (FY25) में भारतीय बैंकिंग सेक्टर में हायरिंग की रणनीति में बड़ा बदलाव देखने को मिला है। आंकड़े बताते हैं कि इस साल इंडस्ट्री में नेट हायरिंग पिछले सालों के मुकाबले करीब 80% कम हो गई है। कुल मिलाकर इस साल सिर्फ 21,000 नई पोजीशन जोड़ी गईं। यह FY23 और FY24 के मुकाबले काफी कम है, जब हर साल एक लाख से ज्यादा नई नौकरियां आई थीं। FY22 में भी 82,600 पोजीशन जोड़ी गई थीं।
सरकारी और प्राइवेट बैंकों की अलग राह
FY25 के अंत तक बैंकिंग इंडस्ट्री में कुल कर्मचारियों की संख्या 18,08,857 थी। लेकिन, यह आंकड़ा सरकारी और प्राइवेट बैंकों की अलग-अलग नीतियों को दिखाता है। प्राइवेट सेक्टर के बैंकों, जिनके पास 8,38,150 कर्मचारी हैं, उन्होंने नेट हायरिंग में 7,257 कर्मचारियों की कटौती की। वहीं, पब्लिक सेक्टर के बैंकों, जिनके पास 7,57,641 कर्मचारी हैं, उन्होंने 1,626 नए कर्मचारी जोड़े। स्मॉल फाइनेंस बैंक (SFB) नेट जॉब क्रिएशन का मुख्य जरिया बने रहे, जिन्होंने करीब 16,000 नए कर्मचारी जोड़कर अपनी संख्या 1.77 लाख तक पहुंचा दी।
प्रमुख बैंकों में कितनी कटौती?
कुछ बड़े प्राइवेट बैंकों के आंकड़े इस कटौती को और स्पष्ट करते हैं। ICICI बैंक ने 6,633 कर्मचारी कम किए, जबकि HDFC बैंक ने 3,343 पोजीशन घटाईं। Axis बैंक और Kotak Mahindra बैंक ने भी क्रमशः 3,116 और 1,269 कर्मचारियों की संख्या कम की। दूसरी ओर, सरकारी बैंक अपनी बड़ी ब्रांच नेटवर्क्स को सपोर्ट करने के लिए लगातार हायरिंग कर रहे हैं। State Bank of India ने 8,905 नए कर्मचारी जोड़े, Bank of Baroda ने 2,139, Punjab National Bank ने 1,350 और Canara Bank ने 1,344 स्टाफ मेंबर्स को हायर किया।
टेक्नोलॉजी और एफिशिएंसी का खेल
प्राइवेट बैंकों में भर्तियों में कमी का मुख्य कारण डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर का तेजी से अपनाया जाना है। बैंक अब कस्टमर सर्विस, लोन प्रोसेसिंग और डिजिटल-फर्स्ट बैंकिंग के लिए AI का भरपूर इस्तेमाल कर रहे हैं। इससे वे कम कर्मचारियों के साथ ज्यादा ट्रांजैक्शन संभाल पा रहे हैं। निवेशकों के लिए, यह कदम ऑपरेटिंग मार्जिन (operating margin) को बेहतर बनाने और कॉस्ट-टू-इनकम रेश्यो (cost-to-income ratio) को कंट्रोल करने की ओर इशारा करता है। स्टाफ पर होने वाले खर्च को कम करके, ये बैंक अपनी मुख्य लागतों को ऑप्टिमाइज़ (optimize) करना चाहते हैं।
संभावित रिस्क और भविष्य का संकेत
हालांकि, इस रणनीति में कुछ रिस्क भी हैं। अगर कस्टमर-फेसिंग रोल्स (customer-facing roles) में ज्यादा कटौती हुई और डिजिटल प्लेटफॉर्म मजबूत नहीं हुए, तो सर्विस क्वालिटी प्रभावित हो सकती है। साथ ही, ऑटोमेशन पर ज्यादा निर्भरता किसी भी टेक्निकल गड़बड़ या सिक्योरिटी इशू को ज्यादा गंभीर बना सकती है। निवेशकों को यह देखना होगा कि क्या इन एफिशिएंसी से रिटर्न ऑन एसेट्स (Return on Assets) में सुधार होता है और क्या सरकारी बैंक भी भविष्य में अपने सिस्टम को मॉडर्नाइज (modernize) करने के साथ इसी ट्रेंड को फॉलो करते हैं। सरकारी और प्राइवेट बैंकों की हायरिंग स्ट्रैटेजी का यह अंतर आने वाली तिमाही रिपोर्ट्स में एक अहम पॉइंट रहेगा।
