इकोनॉमी में नई जान, क्रेडिट ग्रोथ की तूफानी रफ्तार
यह मजबूत क्रेडिट मांग कम ब्याज दरों, सरकारी पहलों और बढ़ते हुए बॉरोअर कॉन्फिडेंस (borrower confidence) जैसे अनुकूल माहौल को दर्शाती है। हालांकि, इस बड़ी तस्वीर के पीछे कुछ जटिलताएं और संभावित कमजोरियां भी छिपी हैं, जिन्हें समझना ज़रूरी है, खासकर जैसे-जैसे क्रेडिट साइकिल (credit cycle) विकसित हो रहा है।
बैंकों का दबदबा, ₹212.9 लाख करोड़ का रिकॉर्ड क्रेडिट
Scheduled Commercial Banks ने मार्च 2026 में समाप्त हुए फाइनेंशियल ईयर (FY26) के लिए नॉन-फूड क्रेडिट में पिछले साल की तुलना में 15.9% का दमदार सालाना ग्रोथ हासिल किया। यह पिछली बार की 10.9% ग्रोथ से काफी तेज है और कुल क्रेडिट आउटस्टैंडिंग को ₹29.2 लाख करोड़ बढ़कर ₹212.9 लाख करोड़ तक ले गया। वित्त मंत्रालय का कहना है कि इसमें कम ब्याज दरें, पब्लिक कैपिटल एक्सपेंडिचर प्रोग्राम, आर्थिक सुधार और व्यवसायों व लोगों के बढ़ते भरोसे का बड़ा योगदान है। क्रेडिट ग्रोथ में इंडस्ट्री, सर्विसेज, पर्सनल लोन और एग्रीकल्चर जैसे सभी प्रमुख सेक्टरों से मांग देखी गई। अच्छी बात यह है कि भारतीय बैंकिंग सेक्टर खुद मजबूत बना हुआ है, जिसमें सॉलिड कैपिटलाइजेशन, ऐतिहासिक रूप से कम इम्पेयर्ड एसेट्स (impaired assets) और लगातार प्रॉफिटेबिलिटी शामिल है, जो ग्लोबल अनिश्चितताओं के बावजूद ज्यादा लेंडिंग के लिए एक मजबूत आधार प्रदान करता है। 2026 की शुरुआत में भारतीय बैंकिंग सेक्टर का औसत P/E रेश्यो लगभग 18x था, जो निवेशकों के भरोसे को दर्शाता है।
MSMEs से लेकर पर्सनल लोन तक, हर जगह तेजी
इंडस्ट्रीज के लिए क्रेडिट की मांग में खास तेजी आई, जिसमें FY26 में 15% की ग्रोथ दर्ज हुई, जबकि FY25 में यह 8.2% थी। माइक्रो, स्मॉल और मीडियम एंटरप्राइजेज (MSMEs) सेगमेंट में तो जबरदस्त उछाल देखने को मिला, जहां माइक्रो और स्मॉल इंडस्ट्रीज को दिए जाने वाले क्रेडिट में 33.1% की सालाना ग्रोथ हुई, वहीं मीडियम स्केल इंडस्ट्रीज 21.7% बढ़ीं। इंफ्रास्ट्रक्चर, बेसिक मेटल्स, केमिकल्स और पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स जैसे सेक्टरों ने इंडस्ट्री ग्रोथ को लीड किया। सर्विसेज सेक्टर, जो कुल क्रेडिट का 28% हिस्सा है, 19% की रफ्तार से बढ़ा, जो पिछली बार के 12% से ज्यादा है। इसमें नॉन-बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनीज (NBFCs), ट्रेड और कमर्शियल रियल एस्टेट से अच्छी मांग रही। पर्सनल लोन, जो क्रेडिट का 33% हैं, 16.2% बढ़े, जो पिछले साल की 11.7% की गति से बेहतर है। हाउसिंग लोन में लगातार प्रगति देखी गई, जबकि व्हीकल और गोल्ड-लोन ने अपनी मजबूत रफ्तार बनाए रखी। एग्रीकल्चर और संबंधित एक्टिविटीज में भी तेजी आई, जहां क्रेडिट ग्रोथ 15.7% रहा, जबकि पिछले साल यह 10.4% था। इसका श्रेय लगातार रूरल डिमांड और फॉर्मल क्रेडिट तक बेहतर पहुंच को जाता है।
RBI की नजर, पर सावधानी ज़रूरी
क्रेडिट ग्रोथ की यह रफ्तार, खासकर 10.9% से 15.9% तक का उछाल, भारतीय बैंकों के लिए एक मजबूत साइक्लिकल अपस्विन्ग (cyclical upswing) का संकेत है, हालांकि यह पूरी तरह से अभूतपूर्व नहीं है। अतीत में तेज क्रेडिट ग्रोथ अक्सर मजबूत GDP ग्रोथ और पॉजिटिव इन्वेस्टर सेंटीमेंट के साथ जुड़ी रही है। हालांकि, ऐसे दौर अक्सर जोखिम भरे साबित हुए हैं अगर उन्हें सावधानी से मैनेज न किया जाए। 2026 की शुरुआत में, रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) ने जहां मजबूत क्रेडिट मोमेंटम को स्वीकार किया, वहीं एसेट क्वालिटी और संभावित इन्फ्लेशन प्रेशर पर सावधानी बरतने पर जोर दिया। मार्च 2026 तक Nifty Bank इंडेक्स में भी पॉजिटिव ट्रेंड देखा गया, जो बैंकिंग सेक्टर में मार्केट के भरोसे को दर्शाता है।
छिपे हुए जोखिम: क्या है चिंता की बात?
मजबूत आंकड़ों के बावजूद, कुछ संभावित जोखिमों पर ध्यान देना ज़रूरी है। MSME लेंडिंग में तेज ग्रोथ, जो प्रभावशाली है, इस सेक्टर की आर्थिक मंदी और ब्याज दर बढ़ने के प्रति संवेदनशीलता के कारण इसमें स्वाभाविक जोखिम हैं। हो सकता है कि इस ग्रोथ का कुछ हिस्सा नए निवेश के बजाय वर्किंग कैपिटल की जरूरतों को पूरा करने के लिए कंपनियों द्वारा लीवरेज बढ़ाने से आया हो, जो अंदरूनी तनाव को छिपा सकता है। इसी तरह, कमर्शियल रियल एस्टेट और पर्सनल लोन (जैसे व्हीकल और गोल्ड-लोन) की मजबूत मांग भी भविष्य में RBI की ब्याज दर नीति में बदलाव के प्रति संवेदनशील हो सकती है। हालांकि वर्तमान इम्पेयर्ड एसेट्स कम हैं, लेकिन अगर अर्थव्यवस्था में अचानक मंदी आती है या कम ब्याज दर का माहौल बदलता है, तो कमजोरियां सामने आ सकती हैं, खासकर अगर ग्रोथ टारगेट्स को पूरा करने के लिए क्रेडिट अंडरराइटिंग स्टैंडर्ड्स में ढील दी गई हो। ऐतिहासिक पैटर्न बताते हैं कि तेज क्रेडिट एक्सपेंशन कभी-कभी सिस्टमैटिक रिस्क (systemic risk) का निर्माण कर सकता है, जो केवल आर्थिक संकुचन के दौरान ही सामने आता है। इसके अलावा, प्रॉफिटेबिलिटी के लिए क्रेडिट ग्रोथ पर अधिक निर्भरता एक कॉम्पिटिटिव मार्केट में बैंकों पर उच्च जोखिम स्वीकार करने का दबाव डाल सकती है। एनालिस्ट्स ने ग्लोबल इकोनॉमिक आउटलुक के अचानक बिगड़ने पर एसेट क्वालिटी में सुधार की सस्टेनेबिलिटी को लेकर भी चिंताएं जताई हैं।
आगे क्या? 12-14% की अनुमानित ग्रोथ
एनालिस्ट्स का आम तौर पर अनुमान है कि FY27 में क्रेडिट ग्रोथ जारी रहेगी, हालांकि इसकी रफ्तार थोड़ी धीमी हो सकती है। यह अनुमान डोमेस्टिक इकोनॉमिक एक्टिविटी के जारी रहने और ग्लोबल कंडीशंस के स्थिर रहने पर निर्भर करेगा। RBI से एक बैलेंस्ड मोनेटरी पॉलिसी बनाए रखने की उम्मीद है, जिसमें ब्याज दरों में धीरे-धीरे बदलाव किए जा सकते हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह होगी कि क्या यह क्रेडिट एक्सपेंशन प्रोडक्टिव कैपेसिटी और जॉब क्रिएशन में तब्दील होता है, या यह एसेट प्राइस इन्फ्लेशन (asset price inflation) या बॉरोअर्स के लिए अनसस्टेनेबल डेट बर्डन (unsustainable debt burden) को बढ़ावा देता है। रेगुलेटर्स से एसेट क्वालिटी, रिस्क मैनेजमेंट और क्रेडिट को प्रोडक्टिव सेक्टर्स की ओर निर्देशित करने पर अपना फोकस बनाए रखने की उम्मीद है। FY27 के लिए अनुमान बताते हैं कि यदि कोई बड़ी आर्थिक शॉक न हो, तो क्रेडिट ग्रोथ 12-14% के दायरे में रह सकती है।
