भारत के बड़े बैंक, HDFC, Axis और ICICI, अब इंटरनेशनल ट्रैवलर्स को टारगेट कर रहे हैं। इन बैंकों ने कम फॉरेक्स (Forex) फीस वाले प्रीमियम क्रेडिट कार्ड्स लॉन्च किए हैं, ताकि हाई-नेट-वर्थ (High-Net-Worth) कस्टमर्स को अपनी ओर खींचा जा सके।
क्या है मामला?
भारतीय बैंक, खास तौर पर HDFC बैंक, Axis बैंक और ICICI बैंक, प्रीमियम क्रेडिट कार्ड्स के ज़रिए अमीर ट्रैवलर्स को अपनी ओर खींचने की ज़बरदस्त होड़ में लगे हैं। इन बैंकों ने खास ट्रेवल कार्ड्स पेश किए हैं, जो इंटरनेशनल खर्चों पर कम फॉरेक्स मार्कअप फीस (जो अक्सर 2% तक घटा दी गई है) और तेज़ी से रिवॉर्ड पॉइंट्स (Reward Points) जैसे फायदे देते हैं। इन कार्ड्स को ऐसे हाई-नेट-वर्थ इंडिविजुअल्स (High-Net-Worth Individuals) को ध्यान में रखकर बनाया गया है, जो बिज़नेस या मौज-मस्ती के लिए अक्सर विदेश यात्रा करते हैं।
बैंक क्यों कर रहे हैं ट्रैवल खर्च करने वालों पर फोकस?
बैंकों का मकसद सिर्फ क्रेडिट कार्ड ट्रांजैक्शन से ज़्यादा कमाना है। कॉम्पिटिटिव फॉरेक्स रेट्स और प्रीमियम लाइफस्टाइल फायदे देकर, बैंक अपने ग्राहकों के 'शेयर ऑफ वॉलेट' (Share of Wallet) को बढ़ाना चाहते हैं। जो कस्टमर ट्रैवल के लिए बैंक का प्रीमियम कार्ड इस्तेमाल करता है, वह ज़्यादा संभावना है कि अपने सेविंग्स अकाउंट, इन्वेस्टमेंट और इंश्योरेंस जैसे दूसरे ज़रूरी बैंकिंग प्रोडक्ट्स भी उसी बैंक में रखेगा।
हालांकि फॉरेक्स मार्कअप फीस आमतौर पर बैंकों की कमाई का एक बड़ा ज़रिया होती है, लेकिन इसे 2% तक कम करना एक सोची-समझी रणनीति है। बैंक असल में अल्पावधि (short-term) में होने वाली फीस की कमाई का कुछ हिस्सा छोड़ रहे हैं, ताकि एक कीमती ग्राहक को कम लागत में हासिल कर सकें और उसे बनाए रख सकें। यह ग्राहक लंबे समय में दूसरे बैंकिंग सेवाओं से ज़्यादा स्थिर मुनाफा देता है।
रिवॉर्ड प्लेटफॉर्म्स की भूमिका
बैंक अपने कस्टमर्स को अपने इकोसिस्टम में बनाए रखने के लिए HDFC बैंक के SmartBuy, ICICI बैंक के iShop और Kotak Unbox जैसे अपने खुद के बुकिंग प्लेटफॉर्म्स का भी इस्तेमाल कर रहे हैं। इन प्लेटफॉर्म्स पर रिवॉर्ड पॉइंट्स की ज़्यादा वैल्यू ऑफर करके, बैंक यूज़र्स को अपनी वेबसाइट से ही फ्लाइट्स और होटल्स बुक करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं। इससे एक ऐसा साइकल बनता है, जहाँ बैंक न सिर्फ क्रेडिट कार्ड इंटरचेंज फीस से कमाता है, बल्कि ट्रैवल बुकिंग कमीशन और कस्टमर की ज़्यादा एंगेजमेंट से भी फायदा उठाता है।
कॉम्पिटिटिव और रेगुलेटरी जोखिम (Risks)
जहां प्रीमियम कार्ड्स को बढ़ाने से बैंकों को अपनी फीस-आधारित आय (fee-based income) बढ़ाने में मदद मिलती है, वहीं यह कुछ चुनौतियां भी खड़ी करता है। भारत का क्रेडिट कार्ड मार्केट बहुत ज़्यादा कॉम्पिटिटिव हो गया है, जिससे कस्टमर एक्विजिशन की लागत (customer acquisition costs) बढ़ गई है। मार्केटिंग, लाउंज एक्सेस (lounge access) की लागत और रिवॉर्ड पॉइंट्स का भुगतान, ये सभी ऐसे बड़े खर्चे हैं जो इस सेगमेंट में बैंक के मुनाफे पर दबाव डाल सकते हैं।
इसके अलावा, निवेशकों को रेगुलेटरी माहौल पर भी नज़र रखनी चाहिए। भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) लगातार अनसिक्योर्ड क्रेडिट (unsecured credit), जिसमें क्रेडिट कार्ड्स भी शामिल हैं, की ग्रोथ पर नज़र रख रहा है। फीस स्ट्रक्चर, कार्ड जारी करने के नियम या क्रेडिट लिमिट्स को लेकर भविष्य में कोई भी रेगुलेटरी बदलाव इन प्रीमियम क्रेडिट कार्ड पोर्टफोलियो की प्रॉफिटेबिलिटी को प्रभावित कर सकता है। जो बैंक आक्रामक कार्ड ग्रोथ पर बहुत ज़्यादा निर्भर हैं, उन्हें जांच का सामना करना पड़ सकता है, अगर बॉरोअर प्रोफाइल की क्वालिटी गिरने लगे या फीस पर कोई रेगुलेटरी कैप (regulatory cap) लगा दिया जाए।
निवेशकों को क्या ट्रैक करना चाहिए?
निवेशक इन बैंकों के तिमाही नतीजों (quarterly results) में 'फी-आधारित आय' (fee-based income) की ग्रोथ पर नज़र रख सकते हैं। एक अहम पैमाना यह होगा कि क्या कार्ड खर्च में बढ़ोतरी दूसरी फाइनेंशियल प्रोडक्ट्स की क्रॉस-सेलिंग (cross-selling) में तब्दील हो रही है। इसके अलावा, सेंट्रल बैंक की ओर से क्रेडिट कार्ड ग्रोथ और लेंडिंग नॉर्म्स (lending norms) को लेकर किसी भी रेगुलेटरी कमेंट्री पर ध्यान देना ज़रूरी है, क्योंकि ये फैक्टर इस बिजनेस सेगमेंट की लॉन्ग-टर्म सस्टेनेबिलिटी को प्रभावित कर सकते हैं।
