Indian Banking Liquidity: बैंकिंग सिस्टम में कैश की भारी किल्लत, **7.5%** के करीब पहुंचे बॉन्ड यील्ड्स

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AuthorNeha Patil|Published at:
Indian Banking Liquidity: बैंकिंग सिस्टम में कैश की भारी किल्लत, **7.5%** के करीब पहुंचे बॉन्ड यील्ड्स

भारतीय बैंकिंग सिस्टम में लिक्विडिटी का संकट गहरा गया है। टैक्स आउटफ्लो, RBI की बॉन्ड बिक्री और कर्ज की बढ़ती मांग ने भारी सरप्लस को अचानक डेफिसिट (Deficit) में बदल दिया है। इस उठा-पटक से सरकारी बॉन्ड यील्ड **7.5%** के स्तर को छू रहे हैं, जिसका सीधा असर अब आपके लोन और डिपॉजिट रेट्स पर पड़ सकता है।

भारतीय बैंकिंग सेक्टर में इस समय कैश की किल्लत देखी जा रही है, जो साल की शुरुआत में रहे भारी सरप्लस के बिल्कुल उलट है। कभी ₹10 लाख करोड़ से ज्यादा का सरप्लस रखने वाला सिस्टम अब कमी से जूझ रहा है, जिससे मनी और बॉन्ड मार्केट में भारी अस्थिरता है। यह बदलाव मुख्य रूप से टैक्स पेमेंट, GST भुगतान, RBI की मार्केट स्टेबिलिटी ऑपरेशंस और इकोनॉमी में क्रेडिट ग्रोथ के कारण आया है।

कैश क्रंच के पीछे की असली वजह

सिस्टम से कैश कम होने के कई बड़े कारण हैं। बैंकों को एडवांस टैक्स और GST की भारी रकम चुकानी पड़ी है। वहीं, RBI ने सरकारी सिक्योरिटीज बेचकर मार्केट से लिक्विडिटी सोख ली है। इसके अलावा, विदेशी मुद्रा भंडार में आई गिरावट—जो $645 अरब से घटकर $597 अरब रह गया है—का असर भी रुपये पर पड़ा है। रिटेल और कॉरपोरेट लोन की ₹15 लाख करोड़ की जबरदस्त मांग और हालिया IPOs में फंसे पैसे ने भी बैंकों के रिसोर्सेज को खींच लिया है।

निवेशकों पर क्या होगा असर?

लिक्विडिटी का यह संकट बैंकों की फंडिंग कॉस्ट बढ़ा रहा है। बैंकों को डिपॉजिट आकर्षित करने के लिए ब्याज दरें बढ़ानी पड़ सकती हैं, जिससे उनका नेट इंटरेस्ट मार्जिन प्रभावित हो सकता है। अगर आपने डेट म्यूचुअल फंड में निवेश किया है, तो आपको पोर्टफोलियो में उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकते हैं, क्योंकि बॉन्ड यील्ड और बॉन्ड प्राइसेज एक-दूसरे के विपरीत चलते हैं। 7.5% पर पहुंच रही 10-साल की बॉन्ड यील्ड फिक्स्ड-इनकम निवेशकों के लिए चुनौती बन गई है।

अब आगे क्या?

RBI फिलहाल वेरिएबल रेट रेपो ऑक्शन के जरिए लिक्विडिटी डालने की कोशिश कर रहा है। निवेशकों को बैंक डिपॉजिट ग्रोथ की रफ्तार, RBI के अगले कदम और ट्रेजरी बिल ऑक्शन के नतीजों पर नजर रखनी चाहिए। सरकारी खर्च बढ़ने और त्योहारों के सीजन के बीच यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या यह दबाव कम होता है या आम ग्राहकों के लिए लोन की किस्तें और महंगी होंगी।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.