कैपिटल सब्स्टिट्यूशन का खेल
भारत के बैंकिंग सिस्टम में लिक्विडिटी (नकदी) की कमी का मुख्य कारण घरों से आने वाले पैसों का एक नया रास्ता खोजना है। जब रिटेल निवेशक (retail investors) बैंक शेयरों में भारी निवेश कर रहे हैं, तो इसका मतलब है कि जो पैसा पहले बैंकों में जमा होता था, वो अब सीधे इक्विटी कैपिटल (equity capital) बन रहा है। इस बदलाव से मॉनेटरी ट्रांसमिशन (monetary transmission) का तरीका बदल रहा है। बैंक भले ही कैपिटल बफर्स (capital buffers) से मजबूत दिख रहे हों, लेकिन उन्हें रोजमर्रा के लोन देने के लिए जरूरी छोटे-छोटे रिटेल डिपॉजिट्स (retail deposits) की भारी कमी महसूस हो रही है।
क्रेडिट और डिपॉजिट का बढ़ता अंतर
लोन की ग्रोथ, जमा राशि की बढ़त से कहीं ज़्यादा तेज़ी से बढ़ रही है। यह अंतर 2026 के बाद और भी बढ़ गया है। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) ने सिस्टम में लिक्विडिटी को लेकर सतर्क रुख अपनाया हुआ है। लेकिन, फिलहाल बैंक ऐसे दौर से गुज़र रहे हैं जहाँ बड़े बैंकों का कैपिटल टू रिस्क-वेटेड एसेट्स रेशियो (CRAR) 17% से 19% के बीच बना हुआ है। ये बफर्स भले ही सिस्टम की स्थिरता सुनिश्चित करते हों, लेकिन ये एक विरोधाभास पैदा करते हैं: बैंक रेगुलेटरी (regulatory) तौर पर 'ओवर-कैपिटलाइज्ड' (over-capitalized) हैं, लेकिन ऑपरेशनल (operational) तौर पर 'अंडर-लिक्विड' (under-liquified) हैं। 2018-2019 के आंकड़ों को देखें तो पता चलता है कि जब बैंक इक्विटी, पारंपरिक बचत की जगह ज़्यादा पसंदीदा निवेश बन जाती है, तो बैंकों के लिए फंड की लागत अपने आप बढ़ जाती है, जिससे नेट इंटरेस्ट मार्जिन (net interest margins) पर दबाव आता है।
खतरे की घंटी: बियर केस (Bear Case)
जमाओं (deposits) के अंतर को भरने के लिए मार्केट-आधारित फंडिंग (market-based funding) पर निर्भरता सिस्टम के लिए बड़ा खतरा पैदा करती है। रिटेल डिपॉजिट्स के विपरीत, जो बाज़ार की छोटी-मोटी उथल-पुथल से ज़्यादा प्रभावित नहीं होते, डेट-मार्केट फंडिंग (debt-market funding) तेज़ी से री-प्राइस (reprice) हो सकती है। अगर बैंकिंग सेक्टर को लेकर बाज़ार का मूड खराब हुआ, तो इन बैंकों को ऐसी लिक्विडिटी की किल्लत झेलनी पड़ सकती है, जिसे सिर्फ कैपिटल बफर्स से ठीक नहीं किया जा सकता। इसके अलावा, ऊंचे क्रेडिट-डिपॉजिट रेशियो (Credit-Deposit ratios) के पीछे भागने की वजह से कई संस्थानों को प्रतिस्पर्धी क्षेत्रों में लोन देने के मानक कम करने पड़े हैं। इससे एक छिपा हुआ क्रेडिट रिस्क (credit risk) पैदा हो गया है, जो मौजूदा मैक्रो इकोनॉमिक (macroeconomic) रफ्तार धीमी पड़ने पर सामने आ सकता है। एनबीएफसी (NBFC) के साथ साझेदारी पर निर्भरता ने जोखिम को और बढ़ाया है, क्योंकि इन सेकेंडरी लेंडर्स (secondary lenders) के साथ एक्सपोजर (exposure) एक छिपा हुआ लीवरेज लूप (leverage loop) बनाता है, जिस पर रेगुलेटर्स की नज़र रखना मुश्किल हो रहा है।
आगे की फंडिंग की राह
आने वाले समय में, जब तक डिपॉजिट-इक्विटी यील्ड स्प्रेड (deposit-equity yield spread) में खास सुधार नहीं होता, तब तक महंगी होलसेल फंडिंग (wholesale funding) पर निर्भरता बनी रहने की संभावना है। वित्तीय संस्थानों पर दबाव है कि वे पारंपरिक बचत उत्पादों (savings products) से आगे बढ़कर पैसे के आउटफ्लो (outflow) को रोकें। मार्केट की आम राय यह है कि जो बैंक अपनी फंडिंग प्रोफाइल (funding profiles) में विविधता नहीं ला पाएंगे, उन्हें इस फाइनेंशियल ईयर (fiscal year) के बाकी हिस्से में मार्जिन पर लगातार दबाव झेलना पड़ेगा, क्योंकि सीधे इक्विटी मार्केट (equity market) में निवेश के आकर्षण के मुकाबले घरों की बचत के लिए प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी।
