सितंबर **2026** तिमाही में सरकारी बॉन्ड यील्ड **7.19%** तक पहुंचने से भारतीय बैंकों की ट्रेजरी कमाई में भारी गिरावट का अनुमान है, जिससे निवेशकों का ध्यान अब मुख्य लेंडिंग बिजनेस पर टिक गया है।
सरकारी बॉन्ड यील्ड में तेज उछाल के चलते बैंकिंग सेक्टर के लिए सितंबर 2026 की तिमाही चुनौतीपूर्ण रहने वाली है। एनालिस्ट्स का अनुमान है कि साल-दर-साल आधार पर ट्रेजरी गेन्स में करीब 60% की बड़ी गिरावट आ सकती है। पिछले साल की समान अवधि में जो मुनाफा ₹13,100 करोड़ था, उसके इस बार घटकर ₹5,500 करोड़ के स्तर पर आने की उम्मीद है।
क्यों कम हो रही है कमाई?
इस गिरावट की मुख्य वजह बॉन्ड यील्ड में आई 44 बेसिस पॉइंट्स की तेजी है, जिससे यह 7.19% तक पहुंच गई है। फाइनेंस की दुनिया का नियम है कि बॉन्ड की कीमतें और यील्ड एक-दूसरे के विपरीत चलते हैं। जब यील्ड बढ़ती है, तो बैंकों के पास मौजूद बॉन्ड्स की मार्केट वैल्यू गिर जाती है। इसे 'मार्क-टू-मार्केट' (Mark-to-market) लॉस कहते हैं, जो बैंकों के मुनाफे पर सीधा असर डालता है।
RBI की पॉलिसी का असर
7 अक्टूबर 2026 को रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) ने रेपो रेट में 25 बेसिस पॉइंट्स की बढ़ोतरी कर इसे 5.50% कर दिया था। इस सख्ती के बाद से बॉन्ड यील्ड में तेजी आई है, जिसने पहले से आ रहे आसान मुनाफे के दौर पर ब्रेक लगा दिया है।
पब्लिक सेक्टर बैंकों पर ज्यादा दबाव
लोन ग्रोथ में अभी भी 19% की अच्छी रफ्तार दिख रही है और कुल प्रॉफिट ग्रोथ 6% रहने की उम्मीद है, लेकिन सरकारी बैंकों (Public Sector Banks) की स्थिति थोड़ी नाजुक है। प्राइवेट बैंकों के मुकाबले इनके पास सरकारी सिक्योरिटीज का बड़ा पोर्टफोलियो होता है, इसलिए ब्याज दरों में अस्थिरता का सबसे ज्यादा असर इन्हीं पर पड़ता है।
अब निवेशकों को अपना फोकस ट्रेजरी से हटाकर कोर ऑपरेटिंग मैट्रिक्स पर रखना होगा। आने वाले समय में बैंकों की प्रॉफिटेबिलिटी इस बात पर निर्भर करेगी कि वे अपने नेट इंटरेस्ट मार्जिन (NIMs) को कैसे मैनेज करते हैं और क्रेडिट कॉस्ट पर कितनी लगाम रखते हैं।
