देश के बैंकिंग सिस्टम में कैश को लेकर बड़ी असमानता देखने को मिल रही है। जहां बड़े बैंक फॉरेन डिपॉजिट्स के जरिए अपना फंडिंग कॉस्ट घटा रहे हैं, वहीं छोटे बैंक महंगे मार्केट बॉरोइंग पर निर्भर होने को मजबूर हैं।
भारतीय बैंकिंग सेक्टर में इन दिनों लिक्विडिटी को लेकर बड़ी खाई पैदा हो गई है। विदेशी मुद्रा (Foreign Currency) के भारी इनफ्लो ने देश के बड़े बैंकों को तो राहत दी है, लेकिन यह पैसा पूरे बैंकिंग सिस्टम में समान रूप से नहीं पहुंच रहा है। नतीजा यह है कि छोटे और मझोले बैंक महंगी मार्केट बॉरोइंग का सहारा ले रहे हैं।
सर्टिफिकेट ऑफ डिपॉजिट का बढ़ा चलन
आंकड़े गवाही दे रहे हैं कि बैंक अब मार्केट से पैसा जुटाने के लिए 'सर्टिफिकेट ऑफ डिपॉजिट' (Certificates of Deposit) का ज्यादा इस्तेमाल कर रहे हैं। सितंबर महीने में इनका वॉल्यूम उछलकर ₹1.15 लाख करोड़ पर पहुंच गया, जबकि अगस्त में यह आंकड़ा महज ₹56,271 करोड़ था। यह सीधा संकेत है कि सिस्टम में कैश की कमी है और बैंकों को फंड्स जुटाने के लिए ज्यादा ब्याज चुकाना पड़ रहा है।
बड़े बैंक कैसे दिखा रहे दम?
बड़े बैंकों ने इस मुश्किल दौर को बेहतर तरीके से संभाला है। विदेशी मुद्रा के इनफ्लो का फायदा उठाते हुए उन्होंने महंगे पुराने डिपॉजिट्स को सस्ते विदेशी फंड्स से बदल दिया है।
- Canara Bank: फॉरेन इनफ्लो के चलते अपने डिपॉजिट कॉस्ट में 1% की कमी दर्ज की है।
- Punjab National Bank: हाई-कॉस्ट डिपॉजिट्स का हिस्सा घटकर 17% रह गया है, जो पिछली तिमाही में 19% था।
छोटे बैंकों की बढ़ रही मुश्किलें
इसके उलट, छोटे बैंक भारी दबाव में हैं। Indian Bank ने माना है कि क्रेडिट डिमांड पूरी करने के लिए उन्हें मार्केट फंड्स पर निर्भर रहना पड़ रहा है। Central Bank of India की स्थिति भी चिंताजनक है, जिसका लिक्विडिटी कवरेज रेशियो गिरकर 155% पर आ गया है, जबकि एक साल पहले यह 242% था। हालांकि, RBL Bank जैसे कुछ मझोले बैंकों ने बेहतर कैश बफर बनाए रखा है, लेकिन छोटे लेंडर्स अभी भी रिस्क जोन में हैं।
इन्वेस्टर्स के लिए यह एक बड़ा अलार्म है। अगर छोटे बैंक महंगे कर्ज पर टिके रहे, तो उनके प्रॉफिट मार्जिन पर चोट निश्चित है। आने वाली तिमाहियों में यह देखना अहम होगा कि बैंक अपने डिपॉजिट कॉस्ट को कैसे मैनेज करते हैं और क्या वे महंगे दौर में भी मुनाफा कमा पाते हैं या नहीं।
