Banking Sector Update: भारतीय बैंकों में जमा राशि **₹284 लाख करोड़** के पार, क्या बढ़ने वाली है ब्याज दरें?

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AuthorKaran Malhotra|Published at:
Banking Sector Update: भारतीय बैंकों में जमा राशि **₹284 लाख करोड़** के पार, क्या बढ़ने वाली है ब्याज दरें?

भारतीय बैंकिंग सिस्टम में डिपॉजिट्स ने नया रिकॉर्ड बनाया है और यह **₹284 लाख करोड़** के स्तर पर पहुंच गया है। मार्च से अब तक इसमें **8.4%** की बढ़ोतरी दर्ज की गई है, लेकिन बढ़ते क्रेडिट डिमांड के बीच बैंकों पर डिपॉजिट रेट्स बढ़ाने का दबाव बन सकता है।

भारतीय बैंकिंग सिस्टम के लिए एक बड़ी उपलब्धि सामने आई है। सितंबर के अंत तक बैंक डिपॉजिट्स का आंकड़ा ₹284 लाख करोड़ के रिकॉर्ड स्तर को छू गया है। मार्च के बाद से इसमें 8.4% का उछाल देखा गया है, जिसमें जून से अगस्त के बीच आई तेजी का बड़ा हाथ रहा। इस तेजी के पीछे का मुख्य कारण रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) द्वारा शुरू की गई डॉलर स्वैप स्कीम थी।

RBI की स्वैप विंडो का असर

जून में RBI ने विदेशी मुद्रा को आकर्षित करने के लिए एक डिस्काउंटेड स्वैप विंडो शुरू की थी। इस पहल का असर इतना शानदार रहा कि बैंकों ने $133 बिलियन की राशि जुटाई। RBI ने इसे उम्मीद से एक महीने पहले यानी 31 अगस्त को ही बंद कर दिया था, जिसने बैंकिंग सिस्टम को लिक्विडिटी का एक बड़ा सहारा दिया।

क्रेडिट डिमांड और डिपॉजिट के बीच संघर्ष

स्वैप विंडो ने तात्कालिक राहत तो दी, लेकिन बैंकिंग सेक्टर के सामने अब एक बड़ी चुनौती है। लोन की डिमांड यानी क्रेडिट ग्रोथ, डिपॉजिट ग्रोथ की तुलना में काफी तेज है। जब बैंकों को लोन देने के लिए डिपॉजिट से ज्यादा पैसा चाहिए होता है, तो उन्हें नया फंड जुटाने के लिए डिपॉजिट पर ब्याज दरें बढ़ानी पड़ती हैं। आंकड़ों के मुताबिक, 30 सितंबर तक के पखवाड़े में ₹7.73 लाख करोड़ का नया इनफ्लो आया है, जो बैंकों की बैलेंस शीट को स्थिर करने की कोशिश को दर्शाता है।

निवेशकों के लिए क्या है संकेत?

केयरएज रेटिंग्स (CareEdge Ratings) के अनुसार, डिपॉजिट के लिए मुकाबला फिलहाल स्थिर है, लेकिन मौजूदा माहौल में डिपॉजिट रेट्स में कटौती की गुंजाइश कम है। जैसे-जैसे लिक्विडिटी सरप्लस घटेगा, बैंकों के मार्जिन पर दबाव बढ़ सकता है। निवेशकों को बैंकों के नेट इंटरेस्ट मार्जिन (NIM) पर नजर रखनी चाहिए। यदि बैंक डिपॉजिट्स के लिए ज्यादा ब्याज चुकाते हैं और उसे ग्राहकों पर नहीं डाल पाते हैं, तो आने वाली तिमाहियों में मुनाफे पर असर पड़ना तय है। निवेशकों को सलाह है कि वे बैंकों की क्वार्टरली कमेंट्री में डिपॉजिट ग्रोथ और लोन-टू-डिपॉजिट रेशियो (LDR) को ध्यान से मॉनिटर करें।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.