भारत के बैंकिंग सेक्टर में डिपॉजिट ग्रोथ पिछले 15 सालों के उच्चतम स्तर पर पहुंच गई है। लिक्विडिटी में आए इस सुधार से बैंकों को अब महंगे फंड पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा, जिससे नेट इंटरेस्ट मार्जिन (NIM) में सुधार की उम्मीद है।
बैंकिंग सेक्टर को बड़ी राहत
अगस्त 2026 में बैंकिंग सिस्टम में लिक्विडिटी की स्थिति में बड़ा बदलाव आया है। पिछले कुछ वर्षों से बैंक डिपॉजिट जुटाने और लोन की बढ़ती मांग के बीच तालमेल बिठाने में संघर्ष कर रहे थे। मई के महीने में 'इंक्रीमेंटल क्रेडिट-डिपॉजिट रेशियो' 114% के स्तर तक पहुंच गया था। जब यह रेशियो इतना अधिक रहता है, तो बैंकों को अपना लोन बुक चलाने के लिए महंगे होलसेल फंड का सहारा लेना पड़ता है, जिससे उनका नेट प्रॉफिट मार्जिन बुरी तरह प्रभावित होता है।
विदेशी मुद्रा का फ्लो बना गेम चेंजर
इस बेहतर लिक्विडिटी के पीछे सबसे बड़ी वजह रिजर्व बैंक (RBI) की स्पेशल फॉरेन करेंसी स्वैप विंडो का 31 अगस्त को बंद होना रही। इस पॉलिसी कदम से $133 बिलियन का बड़ा इनफ्लो सिस्टम में आया। इस विदेशी मुद्रा ने एक 'टैक्टिकल कुशन' का काम किया, जिसने लिक्विडिटी के दबाव को सोख लिया और बैंकों को सस्ता और स्टेबल फंड मुहैया कराया। इसकी बदौलत अगस्त और सितंबर की शुरुआत में सिस्टम में सरप्लस लिक्विडिटी बनी रही।
क्रेडिट ग्रोथ पर असर
लिक्विडिटी की दिक्कतें कम होने के बावजूद लोन की डिमांड में जोरदार मोमेंटम बना हुआ है। 31 अगस्त तक 'नॉन-फूड बैंक क्रेडिट' उछलकर ₹9.84 लाख करोड़ हो गया, जो पिछले साल इसी अवधि में ₹3.83 लाख करोड़ था। यह इस बात का संकेत है कि बैंक उपलब्ध लिक्विडिटी का इस्तेमाल इंडस्ट्रियल एडवांस और FDI से जुड़ी गतिविधियों में सही तरीके से कर रहे हैं।
निवेशकों के लिए आगे क्या?
अब असली परीक्षा यह है कि क्या बैंक इस डिपॉजिट मोमेंटम को बरकरार रख पाएंगे, क्योंकि स्वैप विंडो का वन-टाइम बूस्ट खत्म हो चुका है। निवेशकों को आने वाले क्वार्टरली नतीजों पर नजर रखनी चाहिए, ताकि यह देखा जा सके कि क्या बैंकों ने महंगे होलसेल उधार को कम किया है और इसका उनके प्रॉफिट पर कितना असर पड़ा है।
