अगस्त **2026** के मध्य तक भारतीय बैंकों की क्रेडिट ग्रोथ **18.6%** तक पहुंच गई है, लेकिन यह चमकती हुई तस्वीर के पीछे छिपी एक बड़ी चुनौती है। लोन तो तेजी से बढ़ रहे हैं, लेकिन डिपॉजिट उस रफ्तार से नहीं आ रहे, जो आने वाले समय में लिक्विडिटी और प्रॉफिट मार्जिन पर दबाव डाल सकता है।
क्रेडिट ग्रोथ के असली कारण
इस साल अगस्त तक के बैंकिंग डेटा पर नजर डालें तो क्रेडिट में 18.6% की जो बढ़ोतरी दिख रही है, वह किसी नई इंडस्ट्रियल क्रांति का संकेत नहीं है। असल में, यह ग्रोथ दो मुख्य वजहों से है: वर्किंग कैपिटल की जरूरतें और गोल्ड-बैक्ड लोन। महंगाई के चलते कंपनियों को अपने रोजमर्रा के ऑपरेशंस के लिए ज्यादा कर्ज लेना पड़ रहा है। वहीं, सोने की कीमतों में उछाल की वजह से गोल्ड लोन की लिमिट बढ़ गई है, जिससे लोन बुक का साइज बिना किसी नई इकोनॉमिक प्रोडक्टिविटी के ही फूल रहा है।
लिक्विडिटी और LDR का संकट
बैंकिंग सेक्टर के लिए सबसे बड़ी चिंता का विषय लोन-टू-डिपॉजिट रेशियो (LDR) का लगभग 85% तक पहुंच जाना है। इसका मतलब साफ है—बैंक लोन तो बांट रहे हैं, लेकिन उतनी तेजी से पैसा डिपॉजिट के रूप में वापस नहीं आ रहा। इस असंतुलन के कारण बैंकों को फंड जुटाने के लिए डिपॉजिट रेट्स बढ़ाने पड़ सकते हैं, जिससे बैंकों की फंडिंग कॉस्ट बढ़ेगी और उनके नेट इंटरेस्ट मार्जिन (NIMs) पर सीधा असर पड़ेगा।
निवेशकों के लिए चेतावनी
अगर यही स्थिति बनी रही, तो बैंकों का मुनाफा आने वाली तिमाहियों में सुस्त पड़ सकता है। हालांकि फिलहाल एसेट क्वालिटी स्टेबल दिख रही है, लेकिन अगर MSME और कॉरपोरेट सेक्टर के कैश फ्लो में दिक्कत आई, तो क्रेडिट कॉस्ट बढ़ सकती है।
आगे क्या देखना होगा?
निवेशकों को अब मुख्य रूप से डिपॉजिट इनफ्लो के डेटा पर नजर रखनी चाहिए। इसके अलावा, गोल्ड-बैक्ड लोन के लिए आरबीआई (RBI) के नए नॉर्म्स का सेक्टर पर क्या असर पड़ता है, यह देखना भी महत्वपूर्ण होगा। बैंकों के लिए अब चुनौती यह है कि वे बिना प्रॉफिटेबिलिटी को दांव पर लगाए लोन पोर्टफोलियो को कैसे संभालते हैं।
