देश के बैंकिंग सिस्टम में लोन की डिमांड बढ़कर **16.5%** पर पहुंच गई है, जबकि डिपॉजिट्स की ग्रोथ महज **11.3%** रही है। इस गैप के कारण लोन-टू-डिपॉजिट रेशियो रिकॉर्ड **83.3%** के स्तर पर है, जो निवेशकों के लिए चिंता का विषय बन सकता है।
लिक्विडिटी का बढ़ा दबाव
जून 2026 तक के आंकड़ों पर नजर डालें, तो बैंक क्रेडिट आउटस्टैंडिंग ₹213.6 लाख करोड़ तक पहुंच गया है। डिपॉजिट्स और लोन के बीच का यह 512 बेसिस पॉइंट्स यानी 5.12% का अंतर बैंकिंग सिस्टम के लिए एक नई चुनौती बनकर उभरा है। सिस्टम का लोन-टू-डिपॉजिट रेशियो अब 83.3% के ऐतिहासिक स्तर पर है, जिसका मतलब है कि बैंक उतनी तेजी से फंड जुटा नहीं पा रहे, जितनी रफ्तार से लोन बांट रहे हैं।
क्यों बढ़ रही है लोन की डिमांड?
इस तेजी के पीछे सबसे बड़ा हाथ NBFCs का है, जिन्होंने बैंकों से कर्ज 22.4% बढ़ाकर ₹25.3 लाख करोड़ कर लिया है। बाजार में बॉन्ड के जरिए पैसा जुटाना महंगा होने के कारण कंपनियां अब बैंक लोन को प्राथमिकता दे रही हैं। हालांकि, रिटेल लोन 12.7% बढ़े हैं, लेकिन इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे क्षेत्रों में 1.1% की गिरावट चिंताजनक है।
पब्लिक सेक्टर बैंक सबसे आगे
सरकारी बैंकों ने 17.3% की क्रेडिट ग्रोथ दिखाई है, जो प्राइवेट बैंकों की 14.8% ग्रोथ से कहीं ज्यादा है। इसका असर यह हुआ है कि पब्लिक सेक्टर बैंकों का लोन-टू-डिपॉजिट रेशियो 73.9% से बढ़कर अब 79% हो गया है।
निवेशकों के लिए रिस्क का फैक्टर
निवेशकों को सतर्क रहने की जरूरत है क्योंकि डिपॉजिट्स खींचने के लिए बैंकों को अब एफडी (FD) और सेविंग्स अकाउंट पर ब्याज दरें बढ़ानी पड़ सकती हैं। अगर बैंक इस बढ़ी हुई लागत को कर्जदारों पर नहीं डाल पाए, तो उनके नेट प्रॉफिट मार्जिन (Net Profit Margins) पर बड़ा असर पड़ेगा। आरबीआई (RBI) की मदद का दायरा भी अब कम हो रहा है, और लोग अपना पैसा म्यूचुअल फंड व शेयर मार्केट की ओर शिफ्ट कर रहे हैं, जिससे बैंकों के सामने लिक्विडिटी की बड़ी समस्या खड़ी हो गई है।
