FY26 के दौरान भारतीय एसेट मैनेजमेंट कंपनियों (AMCs) ने म्यूचुअल फंड फीस पूल का बड़ा हिस्सा अपने नाम किया है। मैनेजमेंट फीस **₹28,469 करोड़** तक पहुंच गई है, जिससे डिस्ट्रीब्यूटर्स और RTA प्रोवाइडर्स पर मार्जिन का दबाव बढ़ गया है।
भारतीय म्यूचुअल फंड सेक्टर का गणित FY26 में पूरी तरह बदल गया है। इंडस्ट्री के आंकड़ों के मुताबिक, 21 प्रमुख फंड हाउसों की मैनेजमेंट फीस ₹28,469 करोड़ पर पहुंच गई है, जो पिछले साल के मुकाबले 19.2% अधिक है। यह ग्रोथ रेट सेक्टर के अन्य सर्विस प्रोवाइडर्स की कमाई के मुकाबले काफी तेज है।
डिस्ट्रीब्यूटर्स और RTA पर दबाव
जहां फंड हाउसों की कमाई में जबरदस्त उछाल आया, वहीं डिस्ट्रीब्यूटर कमीशन केवल 13.1% बढ़कर ₹29,637 करोड़ रहा। वहीं, रजिस्ट्रार और ट्रांसफर एजेंटों (RTAs) की फीस में केवल 5.5% की बढ़ोतरी देखी गई, जो ₹2,198 करोड़ रही। यह साफ संकेत है कि अब इंडस्ट्री की इकॉनमी पर एसेट मैनेजमेंट कंपनियों का बोलबाला है। इक्विटी स्कीमों में तो यह अंतर और भी गहरा है, जहां मैनेजमेंट फीस 17.4% बढ़ी, जबकि RTA की लागत में केवल 4.3% की मामूली वृद्धि हुई।
बड़े खिलाड़ियों का बोलबाला
मार्केट में HDFC AMC और ICICI Prudential AMC जैसे दिग्गज फंड हाउसों के पास जबरदस्त 'बार्गेनिंग पावर' है, जिससे वे रेवेन्यू का बड़ा हिस्सा अपने पास रखने में कामयाब रहे हैं। इसके उलट, छोटे खिलाड़ी अक्सर एसेट्स जुटाने के चक्कर में अपना 90% तक रेवेन्यू डिस्ट्रीब्यूटर्स को देने को मजबूर हो जाते हैं।
सर्विस प्रोवाइडर्स के लिए चुनौतियां
CAMS और KFin Technologies जैसी कंपनियों के लिए यह स्थिति चुनौतीपूर्ण है। जैसे-जैसे फंड हाउसों का 'एसेट्स अंडर मैनेजमेंट' (AUM) बढ़ रहा है, वे कॉन्ट्रैक्ट रिन्यूअल के समय शर्तों को अपने पक्ष में झुका रहे हैं। SBI Mutual Fund का हालिया मामला इसका उदाहरण है, जहां एसेट्स बढ़ने के बावजूद RTA फीस उस अनुपात में नहीं बढ़ी। अब निवेशकों की नजर इस बात पर है कि क्या RTA कंपनियां वॉल्यूम या टेक्नोलॉजी के दम पर इस मार्जिन दबाव को झेल पाएंगी या नहीं।
