देश के **10-Year Government Bond** यील्ड में दो महीनों के भीतर **100 basis points** की बड़ी बढ़ोतरी देखी गई है। RBI की सख्ती और लिक्विडिटी के दबाव के बीच अब कंपनियों का कर्ज लेना महंगा हो गया है, जिसका असर जल्द ही आम ग्राहकों की ईएमआई (EMI) पर भी दिख सकता है।
बॉन्ड मार्केट में मची हलचल के बीच 10-Year Benchmark Government Bond यील्ड का 100 basis points चढ़ जाना एक बड़े संकेत की तरह है। याद रखें, जब यील्ड बढ़ती है, तो बॉन्ड की कीमतें गिरती हैं। इसका सीधा असर यह हो रहा है कि सरकारी और प्राइवेट, दोनों तरह की संस्थाओं के लिए पैसा जुटाना महंगा साबित हो रहा है। हाल ही में RBI ने ट्रेजरी बिल ऑक्शन में सभी बोलियों को खारिज कर दिया, जो बाजार की बढ़ती यील्ड की मांग और लिक्विडिटी के दबाव को रोकने की एक कोशिश थी।
कंपनियों पर बढ़ता दबाव
फंडरेजिंग (Fundraising) की योजनाएं बुरी तरह प्रभावित हुई हैं। सरकारी कंपनियां, जिन्हें पहले सस्ता कर्ज मिल जाता था, उन्हें अब 5-year funding के लिए 70 basis points ज्यादा ब्याज देना पड़ रहा है। प्राइवेट सेक्टर की कंपनियों के लिए स्थिति और भी चुनौतीपूर्ण है। अच्छी रेटिंग न होने वाली कंपनियों को अब निवेशकों को लुभाने के लिए सरकारी दरों से 100 से 150 basis points तक ज्यादा प्रीमियम देना पड़ रहा है। नतीजतन, कई कॉर्पोरेट्स ने अपने बॉन्ड जारी करने की योजना को फिलहाल ठंडे बस्ते में डाल दिया है।
बैंकों और आम ग्राहकों पर असर
बैंकों के लिए भी स्थिति नाजुक है क्योंकि उनके पोर्टफोलियो में सरकारी सिक्योरिटीज की भरमार है। यील्ड बढ़ने से इन बॉन्ड्स की वैल्यू घट रही है, जिससे बैंकों के खजाने पर 'पेपर लॉस' का दबाव बढ़ रहा है। अगस्त में लेंडिंग रेट 8.61% पर दर्ज की गई थी, लेकिन अब बैंक अपने लोन रेट्स बढ़ाने की तैयारी में हैं। कम ब्याज दर के दौर का खत्म होना लगभग तय है, और आने वाले हफ्तों में इसका सीधा बोझ आम कर्जदारों की जेब पर पड़ सकता है।
