क्या है सरकार का प्लान?
इस समीक्षा का मुख्य मकसद फॉरेन और स्ट्रैटेजिक कैपिटल (Foreign & Strategic Capital) को आकर्षित करना है। इस समिति में रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) के अधिकारी और पब्लिक सेक्टर बैंक (Public Sector Bank) के बड़े एग्जीक्यूटिव्स शामिल होंगे। यह कदम भारतीय बैंकों को ग्लोबल लेवल पर और ज़्यादा कॉम्पिटिटिव बनाने की दिशा में एक बड़ा मूव है। अभी नियम के तहत, विदेशी निवेशक प्राइवेट बैंकों में कुल 74% तक हिस्सेदारी रख सकते हैं, लेकिन वोटिंग पावर सिर्फ 26% तक सीमित है। ऐसे में बड़े शेयरहोल्डर्स ऑपरेशनल कंट्रोल (Operational Control) में ज़्यादा दखल चाहते हैं।
ग्लोबल टॉप बैंकों में शामिल होने की मंशा
सरकार की मंशा है कि भारत के कम से कम 2 बैंक दुनिया के टॉप 20 बैंकों की लिस्ट में एसेट साइज (Asset Size) के मामले में शामिल हों। इसके लिए सिर्फ कैपिटल ही नहीं, बल्कि स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप (Strategic Partnership) और विदेशी भागीदारी को बढ़ाना भी ज़रूरी है। अगर वोटिंग राइट्स कैप बढ़ाई जाती है, तो यह मर्जर और एक्विजिशन (Mergers & Acquisitions) के नए दरवाजे खोल सकता है, जिससे सेक्टर कंसॉलिडेट (Consolidate) हो सकता है और टारगेटेड कंपनियों के वैल्यूएशन्स (Valuations) बढ़ सकते हैं।
लेजिस्लेटिव अमेंडमेंट्स और IDBI बैंक का मसला
वोटिंग राइट्स कैप में कोई भी बड़ा बदलाव लाने के लिए पार्लियामेंट (Parliament) से मंजूरी लेनी होगी और बैंकिंग रेगुलेशन एक्ट 1949 (Banking Regulation Act, 1949) में संशोधन करना होगा। IDBI बैंक के प्राइवटाइजेशन (Privatization) के दौरान यह चुनौती साफ दिखी, जहां निवेशक अपनी हिस्सेदारी के बराबर वोटिंग राइट्स चाहते थे, जो मौजूदा नियमों के तहत मुमकिन नहीं था। विदेशी संस्थाएं लंबे समय से इस नियम को अपने लिए एक बड़ी बाधा मानती रही हैं।
विदेशी कंट्रोल का जोखिम?
इन संभावित फायदों के बावजूद, नियमों में बदलाव का रास्ता आसान नहीं है। पार्लियामेंट में इस संवेदनशील मुद्दे पर सहमति बनना एक बड़ी चुनौती है। वहीं, RBI के पास ऐसे ओवरसाइट पावर्स (Oversight Powers) हैं जो किसी भी निवेशक की महत्वाकांक्षाओं को सीमित कर सकते हैं, चाहे उनकी हिस्सेदारी कितनी भी हो। साथ ही, भारतीय बैंकों की मौजूदा एसेट क्वालिटी चैलेंजेस (Asset Quality Challenges) और बैड लोन (Bad Loan) की समस्या के चलते, विदेशी निवेशक बड़ी रकम लगाने में झिझक सकते हैं।
आगे क्या?
समिति से अगले लगभग तीन महीने में अपनी पूरी रिपोर्ट आने की उम्मीद है। इसके बाद लेजिस्लेटिव (Legislative) चर्चाएं शुरू होंगी। निवेशक और एनालिस्ट (Analysts) इन रिफॉर्म्स (Reforms) पर सरकार के कमिटमेंट और RBI के रुख पर बारीकी से नज़र रखेंगे।
