भारत और अमेरिका के 10-वर्षीय सरकारी बॉन्ड के बीच का ब्याज दर अंतर (Yield Gap) गिरकर **194 बेसिस पॉइंट्स** पर आ गया है, जो पिछले **22 सालों** में सबसे कम है। यह गिरावट विदेशी निवेशकों के लिए भारतीय डेट मार्केट के आकर्षण को कम कर रही है, जिससे रुपये पर दबाव बढ़ना तय है।
बाजार पर क्या पड़ेगा असर?
8 अक्टूबर, 2026 तक भारत के 10-वर्षीय बॉन्ड और अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड के बीच का यह अंतर सिमटकर 194 बेसिस पॉइंट्स के पास पहुंच गया है। इसकी सबसे बड़ी वजह अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड में आई जोरदार तेजी है, जो 5.35% के करीब यानी 24 साल के उच्चतम स्तर पर पहुंच गई है। वहीं, भारत में RBI द्वारा रेपो रेट को 25 बेसिस पॉइंट्स बढ़ाकर 5.50% करने के बावजूद, भारतीय बॉन्ड यील्ड करीब 7.29% पर ही बनी हुई है, जो अमेरिका की तुलना में काफी धीमी गति से बढ़ी है।
क्यों चिंता में हैं विदेशी निवेशक?
ग्लोबल निवेशक अक्सर 'कैरी ट्रेड' (Carry Trade) का फायदा उठाते हैं, जहाँ वे कम ब्याज दर वाले देशों से उधार लेकर ज्यादा ब्याज दर वाले देशों में पैसा लगाते हैं। जब भारत और अमेरिका के बॉन्ड यील्ड के बीच का गैप बड़ा होता है, तो भारत निवेशकों की पहली पसंद होता है। लेकिन अब जैसे-जैसे यह फासला कम हो रहा है, विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) के लिए अमेरिकी एसेट्स ज्यादा सुरक्षित और फायदेमंद नजर आ रहे हैं। अगर यह चलन जारी रहा, तो भारतीय डेट मार्केट में विदेशी निवेश की रफ्तार धीमी हो सकती है।
रुपये और महंगाई पर मार
बॉन्ड यील्ड के बीच कम होता अंतर सीधे तौर पर रुपये की सेहत बिगाड़ सकता है। विदेशी कैपिटल इनफ्लो कम होने से बाजार में रुपये की मांग घटेगी, जिससे यह डॉलर के मुकाबले और कमजोर हो सकता है। एक कमजोर रुपया न केवल क्रूड ऑयल जैसे इम्पोर्ट को महंगा बनाएगा, बल्कि देश में महंगाई (Inflation) का खतरा भी बढ़ा सकता है।
इसके अलावा, बढ़ती बॉन्ड यील्ड का मतलब है कि सरकार और प्राइवेट कंपनियों के लिए उधार लेना (Borrowing Costs) और महंगा हो जाएगा, जिसका सीधा असर कंपनियों के प्रॉफिट मार्जिन और नई परियोजनाओं पर पड़ सकता है। अब निवेशकों की नजरें RBI के अगले फैसलों और अमेरिका में यील्ड की चाल पर टिकी हैं।
