डिपॉजिट इंश्योरेंस में बड़ा बदलाव: 'रिस्क-बेस्ड प्रीमियम' की शुरुआत
भारतीय बैंकिंग सेक्टर 1 अप्रैल 2026 से एक महत्वपूर्ण रेगुलेटरी बदलाव के लिए तैयार है। डिपॉजिट इंश्योरेंस एंड क्रेडिट गारंटी कॉर्पोरेशन (DICGC), रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) की मंजूरी से, एक 'रिस्क-बेस्ड प्रीमियम' (RBP) फ्रेमवर्क लागू करने जा रहा है। यह दशकों पुराने फ्लैट-रेट प्रीमियम सिस्टम को बदल देगा, जिसमें सभी बैंकों से एक समान दर से प्रीमियम लिया जाता था। वर्तमान में, यह दर 12 पैसे प्रति ₹100 के असेसेबल डिपॉजिट पर लागू है। RBI के सेंट्रल बोर्ड ने 19 दिसंबर, 2025 को इस नए, जोखिम-संवेदनशील व्यवस्था को मंजूरी दी है, जिसका लक्ष्य बैंकिंग क्षेत्र में अधिक अनुशासन और जवाबदेही लाना है।
जोखिम प्रबंधन को मिलेगा बढ़ावा, प्रीमियम दरें होंगी अलग
इस नए RBP फ्रेमवर्क का सबसे बड़ा मकसद बैंकों के भीतर वित्तीय अनुशासन को बढ़ाना और उनके जोखिम प्रबंधन (risk management) को बेहतर बनाना है। अब, जिन बैंकों की फाइनेंशियल हेल्थ अच्छी है, जिनका एसेट क्वालिटी बेहतर है और जिनकी गवर्नेंस मजबूत है, उन्हें कम प्रीमियम भरना पड़ेगा। वहीं, जिन बैंकों में जोखिम ज्यादा है और डिपॉजिट इंश्योरेंस फंड (DIF) को नुकसान पहुंचाने की आशंका अधिक है, उन्हें ज्यादा प्रीमियम देना होगा। यह बदलाव सिर्फ लागत का समायोजन नहीं है, बल्कि यह बैंकों को बेहतर जोखिम लेने और ऑपरेशनल एक्सीलेंस की ओर ले जाने का एक जरिया है, जिससे बैंकिंग सिस्टम की स्थिरता और निवेशकों का भरोसा बढ़ेगा।
असेसमेंट मॉडल और वैश्विक तुलना
इस RBP फ्रेमवर्क में मुख्य रूप से दो तरह के रिस्क असेसमेंट मॉडल का इस्तेमाल किया जाएगा। शेड्यूल्ड कमर्शियल बैंकों (रीजनल रूरल बैंकों को छोड़कर) के लिए 'टियर 1' मॉडल होगा, जिसमें सुपरवाइजरी रेटिंग, CAMELS पैरामीटर्स (कैपिटल एडिक्वेसी, एसेट्स, मैनेजमेंट, अर्निंग्स, लिक्विडिटी, और सिस्टम्स & कंप्लायंस) के आधार पर क्वांटिटेटिव असेसमेंट और DIF को संभावित नुकसान का अनुमान शामिल होगा। रीजनल रूरल बैंकों और को-ऑपरेटिव बैंकों के लिए 'टियर 2' मॉडल होगा, जो इसी तरह के CAMELS-आधारित असेसमेंट और लॉस एस्टिमेशन पर आधारित होगा। इसके अलावा, फ्रेमवर्क में मौजूदा दर पर 33.33% तक का रिस्क-बेस्ड एडजस्टमेंट और लंबे समय से क्लेम-फ्री योगदान देने वाले बैंकों के लिए 25% तक का विंटेज-बेस्ड इंसेंटिव भी शामिल है। दुनिया भर में, अमेरिका की फेडरल डिपॉजिट इंश्योरेंस कॉर्पोरेशन (FDIC) और यूरोप में प्रस्तावित यूरोपियन डिपॉजिट इंश्योरेंस स्कीम (EDIS) जैसी संस्थाएं भी इसी तरह की जोखिम-आधारित प्रीमियम दरों का इस्तेमाल करती हैं।
आर्थिक परिदृश्य और भविष्य की राह
FY27 के लिए जीडीपी ग्रोथ के 6.8% से 7.2% के बीच रहने का अनुमान और ऐतिहासिक रूप से निम्न महंगाई दर, इस रेगुलेटरी बदलाव के लिए एक मजबूत भारतीय आर्थिक माहौल तैयार करती है। हालांकि बैंकिंग सेक्टर ने नॉन-परफॉर्मिंग एसेट्स (NPAs) में कमी के साथ लचीलापन दिखाया है, डिपॉजिट इंश्योरेंस प्रीमियम में यह बदलाव विशेष रूप से उन संस्थानों के लिए लेंडिंग रेट्स और क्रेडिट उपलब्धता को प्रभावित कर सकता है, जिनके प्रीमियम बढ़ने की उम्मीद है। एनालिस्ट्स का मानना है कि सुधारों और संभावित ब्याज दर समायोजन से भारतीय बैंकिंग का आउटलुक बेहतर हो रहा है। कुछ बैंक, जैसे लोकल एरिया बैंक और पेमेंट बैंक, डेटा की कमी के कारण, पुराने फ्लैट रेट सिस्टम का ही पालन करते रहेंगे। इस RBP फ्रेमवर्क की प्रभावशीलता सुनिश्चित करने के लिए इसकी समीक्षा हर तीन साल में की जाएगी।