India Securitisation Market: ₹61,000 करोड़ का आंकड़ा पार, NBFCs की धूम!

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AuthorNeha Patil|Published at:
India Securitisation Market: ₹61,000 करोड़ का आंकड़ा पार, NBFCs की धूम!

भारत का सिक्युरिटाइजेशन मार्केट (Securitisation Market) नए फाइनेंशियल ईयर (FY27) की पहली तिमाही में ज़बरदस्त रफ्तार पर है। इस दौरान मार्केट का वॉल्यूम **20%** बढ़कर **₹61,000 करोड़** पर पहुँच गया है। नॉन-बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनियों (NBFCs) इस ग्रोथ की अगुवाई कर रही हैं, जो फंड जुटाने और लिक्विडिटी मैनेजमेंट के लिए सिक्युरिटाइजेशन का इस्तेमाल कर रही हैं। गोल्ड और व्हीकल लोन इस बाजार में सबसे ज्यादा देखे जा रहे हैं।

NBFCs का बढ़ा दबदबा

लोन को बंडल करके निवेशकों को बेचने की प्रक्रिया, जिसे सिक्युरिटाइजेशन कहते हैं, 2026-27 के फाइनेंशियल ईयर की शुरुआत में मजबूत गति से आगे बढ़ी है। अप्रैल-जून की तिमाही में कुल वॉल्यूम ₹61,000 करोड़ अनुमानित है, जो पिछले साल की इसी अवधि की तुलना में 20% ज्यादा है। इंडस्ट्री के अनुमानों के मुताबिक, FY27 के अंत तक यह मार्केट ₹2.6 लाख करोड़ से ₹2.7 लाख करोड़ तक पहुँच सकता है।

एनबीएफसी (NBFCs) इस मार्केट की ग्रोथ की मुख्य वजह बनी हुई हैं। भले ही कुछ बड़ी कंपनियों ने अपने सेल-डाउन वॉल्यूम घटाए हैं, लेकिन छोटी और मध्यम आकार की लेंडर्स की बढ़ी हुई भागीदारी ने मार्केट को एक्टिव रखा है। इन कंपनियों के लिए, सिक्युरिटाइजेशन फंड जुटाने और कैश फ्लो को मैनेज करने का एक अहम जरिया है। वहीं, पिछले साल से ट्रेडिशनल बैंकों ने सिक्युरिटाइजेशन में कम दिलचस्पी दिखाई है, जिससे यह मार्केट नॉन-बैंक ओरिजिनेटर्स के हावी हो गया है।

गोल्ड और व्हीकल लोन सबसे आगे

सिक्युरिटाइजेशन मार्केट का आधार गोल्ड लोन और व्हीकल लोन बने हुए हैं। पहली तिमाही के दौरान, कुल वॉल्यूम में गोल्ड लोन का हिस्सा लगभग 28% रहा, जबकि व्हीकल लोन 25% के साथ दूसरे स्थान पर रहे। मॉर्गेज लोन और माइक्रोफाइनेंस पोर्टफोलियो का हिस्सा 13%-13% रहा। खास तौर पर, माइक्रोफाइनेंस सेक्टर में कलेक्शन एफिशिएंसी में सुधार देखा गया है, जिससे इन एसेट्स में निवेशकों का भरोसा बढ़ा है। हालांकि, MSME और बिजनेस लोन के सिक्युरिटाइजेशन में नरमी आई है, क्योंकि निवेशक व्यापक आर्थिक दबावों के कारण इन सेगमेंट में संभावित स्ट्रेस को लेकर सतर्क हैं।

ट्रांजेक्शन स्ट्रक्चर और निवेशक

मार्केट पार्टिसिपेंट्स ने ज्यादातर डायरेक्ट असाइनमेंट (DA) का इस्तेमाल किया, जो पहली तिमाही में कुल वॉल्यूम का 53% रहा, जबकि पास-थ्रू सर्टिफिकेट्स (PTCs) ने बाकी 47% का योगदान दिया। स्ट्रक्चर की प्राथमिकता एसेट क्लास पर निर्भर करती है; उदाहरण के लिए, गोल्ड और मॉर्गेज पोर्टफोलियो आमतौर पर DA रूट से ट्रांजेक्ट किए जाते हैं, जबकि व्हीकल और माइक्रोफाइनेंस लोन अक्सर PTC स्ट्रक्चर का उपयोग करते हैं।

निवेशकों के लिए, सबसे महत्वपूर्ण बात अंडरलाइंग लोन पूल्स की स्थिरता बनी हुई है। गोल्ड-बेक्ड एसेट्स को कोलैटरल के कारण क्रेडिट रिस्क कम माना जाता है, वहीं MSME या माइक्रोफाइनेंस लोन जैसी अन्य एसेट क्लास ब्याज दरों में उतार-चढ़ाव और आर्थिक चक्रों के प्रति अधिक संवेदनशील होती हैं। भविष्य में मार्केट की ग्रोथ संभवतः इन ओरिजिनेटर्स की मजबूत एसेट क्वालिटी बनाए रखने की क्षमता और बैंकों तथा अन्य संस्थागत निवेशकों की इन लोन बंडलों को खरीदना जारी रखने की इच्छा पर निर्भर करेगी। निवेशक कलेक्शन ट्रेंड्स पर आगामी डेटा और भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) से किसी भी नियामक अपडेट पर नजर रख सकते हैं जो इन एसेट्स को बंडल करने और बेचने के तरीके को प्रभावित कर सकता है।

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