सोने के कर्ज ने भरी उड़ान, रिटेल लोन पहुंचा नए मुकाम पर
भारत के रिटेल लेंडिंग सेगमेंट में जबरदस्त उछाल देखने को मिला है, जो फाइनेंशियल ईयर 2026 की दिसंबर तिमाही में 18.1% बढ़कर ₹162 लाख करोड़ हो गया। इस बंपर ग्रोथ की सबसे बड़ी वजह रहा सोने के कर्ज (Gold Loans) में आई 44.1% की शानदार तेजी। यह दिखाता है कि कैसे सोने की ऊंची कीमतों और त्योहारी सीजन की डिमांड ने लोगों को जमकर कर्ज लेने के लिए प्रेरित किया।
सोने का बढ़ता दबदबा
सोने के कर्ज में 44.1% का इजाफा, जो कि ₹16.2 लाख करोड़ तक पहुंच गया, उधार लेने के पैटर्न में आए बड़े बदलाव को दिखाता है। इसकी मुख्य वजह सोने की कीमतों में आया भारी उछाल है, जो फरवरी 2026 तक घरेलू बाजार में करीब ₹1,75,000 प्रति 10 ग्राम के स्तर पर पहुंच गया था। वैश्विक अनिश्चितताओं और कमजोर होते रुपये के बीच सोने को एक सुरक्षित निवेश माना जा रहा है। इससे न सिर्फ गिरवी रखे सोने की कीमत बढ़ी है, बल्कि लोगों और किसानों को नकदी की जरूरतें पूरी करने के लिए अपने सोने को भुनाने का मौका भी मिला है। यह सेगमेंट अब कुल रिटेल लेंडिंग पोर्टफोलियो का लगभग 10% हिस्सा बन गया है। बैंक भी NBFCs से आगे निकलते हुए इस सेक्टर में अपनी हिस्सेदारी तेजी से बढ़ा रहे हैं।
अन्य सेगमेंट्स में भी दिखी रौनक
सोने के अलावा, रिटेल के दूसरे बड़े सेगमेंट्स में भी अच्छी ग्रोथ रही। होम लोन, जो कि पोर्टफोलियो का सबसे बड़ा हिस्सा है, 10.5% बढ़कर ₹43 लाख करोड़ हो गया। इससे प्रॉपर्टी मार्केट में मजबूत मांग का संकेत मिलता है। पर्सनल लोन में 11.6% की बढ़ोतरी हुई, जबकि ऑटो लोन 14.6% और कंज्यूमर ड्यूरेबल लोन 14.3% बढ़े। GST दरों में हुए बदलावों से भी इन सेगमेंट्स को फायदा मिला। वहीं, छोटे व्यवसायों के लिए दिए जाने वाले लोन (Sole Proprietor Entities) में 26.2% का उछाल देखा गया। कुल मिलाकर, फाइनेंशियल ईयर 2026 के लिए रिटेल लोन ग्रोथ 17-18% रहने का अनुमान है।
एसेट क्वालिटी: मिली-जुली तस्वीर
ऊपर से देखने पर, एसेट क्वालिटी में सुधार दिख रहा है। दिसंबर 2025 तक 30 से 180 दिनों के बीच रिटेल लोन की जो देनदारियां ओवरड्यू (Overdue) थीं, उनका अनुपात घटकर 2.8% रह गया, जो पिछले साल 3.2% था। यह ज्यादातर सेगमेंट्स में उधारकर्ताओं के बेहतर व्यवहार को दर्शाता है। वहीं, सितंबर 2024 तक पूरे बैंकिंग सिस्टम का ग्रॉस नॉन-परफॉर्मिंग एसेट (GNPA) रेशियो 1.2% पर स्थिर था।
लेकिन, इस आंकड़े के पीछे छिपे जोखिमों को समझना जरूरी है, खासकर असुरक्षित कर्ज (Unsecured Loans) वाले सेगमेंट में। असुरक्षित लोन के लिए GNPA रेशियो 1.7% है, जो कि काफी ज्यादा है। इसके अलावा, रिटेल पोर्टफोलियो में जो नए NPA बढ़ रहे हैं, उनमें 51.9% हिस्सेदारी असुरक्षित कर्जों की है (सितंबर 2024 तक)।
सेक्टर की तुलना और मैक्रो इकोनॉमिक माहौल
रिटेल लोन में 18.1% की ग्रोथ, दिसंबर 2025 तक बैंक क्रेडिट की कुल ग्रोथ (जो लगभग 14.5% थी) से काफी ज्यादा है। यह ग्रोथ मजबूत मैक्रो इकोनॉमिक माहौल में हुई है, जहां 2026 के लिए GDP ग्रोथ 6.9% से 7.3% रहने का अनुमान है। महंगाई भी काफी कम, औसतन 1.7% (अप्रैल-दिसंबर 2025) रही और दिसंबर 2025 तक रेपो रेट 5.25% पर था, जो आसान मॉनेटरी पॉलिसी का संकेत देता है। Nifty Bank इंडेक्स का P/E लगभग 16.49 है, जो वित्तीय क्षेत्र में निवेशकों के भरोसे को दिखाता है।
हालांकि, भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने मार्च 2024 के बाद से खपत-आधारित (Consumption-led) कर्जों की मांग और सप्लाई में नरमी के संकेत दिए हैं।
जोखिम और भविष्य की चिंताएं
सोने की कीमतों में उछाल और त्योहारी खर्चों से प्रेरित यह रिटेल लेंडिंग ग्रोथ कितनी टिकाऊ है, इस पर सवाल उठ रहे हैं। सोने की बढ़ती कीमतों पर भारी निर्भरता, आर्थिक विस्तार के बजाय नकदी की तात्कालिक जरूरत को दर्शा सकती है। RBI ने खासतौर पर असुरक्षित कर्जों को लेकर चिंता जताई है, जिसमें राइट-ऑफ (Write-offs) की संख्या तेजी से बढ़ी है। यह अंडरराइटिंग स्टैंडर्ड्स (Underwriting Standards) में नरमी और बिगड़ती एसेट क्वालिटी को छिपा सकता है।
हालांकि रेगुलेटरी एक्शन के बाद असुरक्षित रिटेल लेंडिंग की ग्रोथ सितंबर 2024 तक घटकर 15.6% पर आ गई थी, फिर भी इसमें जोखिम बना हुआ है। नए रिटेल NPAs का एक बड़ा हिस्सा इसी सेगमेंट से आ रहा है। नवंबर 2023 में RBI ने असुरक्षित कर्जों के लिए रिस्क वेट (Risk Weight) बढ़ाए थे, जिनके पूरे असर का दिखना बाकी है। साथ ही, कई रिटेल प्रोडक्ट्स के लिए क्रेडिट सप्लाई में कमी आई है, जो भविष्य की ग्रोथ के लिए संभावित बाधाएं पैदा कर सकती है।
आगे का रास्ता
इन संभावित जोखिमों के बावजूद, विश्लेषकों को लोन ग्रोथ जारी रहने की उम्मीद है। Nomura का अनुमान है कि सिस्टम क्रेडिट ग्रोथ FY26 तक सुधरकर 12% हो सकती है। रिटेल लेंडिंग इकोसिस्टम में रिकवरी के संकेत हैं, जो सरकारी प्रोत्साहनों और खपत के बढ़ते आधार का समर्थन कर रहा है। हालांकि, सोने की लगातार ऊंची कीमतें और असुरक्षित कर्ज के जोखिमों को मैनेज करने पर रेगुलेटर्स का फोकस, इस सेक्टर के भविष्य की दिशा तय करेगा।