साल 2026 के पहले छह महीनों में भारत में प्राइवेट क्रेडिट की फंडिंग में भारी गिरावट आई है। कुल **$3.5 बिलियन** का निवेश हुआ, जो पिछले साल की समान अवधि की तुलना में **61%** कम है। इस गिरावट की मुख्य वजह पिछले साल का हाई बेस और ग्लोबल निवेशकों के बदलते रुख को माना जा रहा है। विदेशी निवेशकों की दिलचस्पी कम होने के बावजूद, घरेलू फंड्स अब निवेश का लगभग **तीन-चौथाई** हिस्सा जुटा रहे हैं, जिसमें रियल एस्टेट सबसे बड़ा डेस्टिनेशन बना हुआ है।
क्यों आई इतनी बड़ी गिरावट?
साल 2026 के पहले हाफ में भारत में प्राइवेट क्रेडिट की एक्टिविटी में बड़ी गिरावट देखी गई। कुल निवेश $3.5 बिलियन रहा, जबकि 2025 की पहली छमाही में यह आंकड़ा $9 बिलियन था। यह 61% की गिरावट किसी बड़े आर्थिक संकट के कारण नहीं, बल्कि पिछले साल के अत्यधिक ऊंचे स्तर के कारण है। दरअसल, 2025 के आंकड़े एक अकेले बड़े $3.1 बिलियन के फंडरेज की वजह से काफी inflate हो गए थे। इस तरह के बड़े लेनदेन को हटा दें तो, प्राइवेट क्रेडिट की डिमांड अभी भी बनी हुई है, हालांकि मार्केट अब एक थोड़ी सतर्क मैक्रो इकोनॉमिक माहौल से गुजर रहा है।
घरेलू फंड्स का दबदबा बढ़ा
मार्केट में एक बड़ा बदलाव यह आया है कि अब देश के अंदरूनी फंड्स पर निर्भरता बढ़ गई है। भारतीय फंड्स ने आगे आकर कुल निवेश का लगभग 75% हिस्सा जुटाया है। यह 2025 की पहली छमाही के उलट है, जब विदेशी फंड्स का दबदबा था और उन्होंने 68% कैपिटल का योगदान दिया था। ग्लोबल निवेशक जहां वोलेटिलिटी (volatility) से जूझ रहे हैं और इमर्जिंग मार्केट्स (emerging markets) में अपने निवेश पर दोबारा गौर कर रहे हैं, वहीं Kotak Alternate Assets Management, Avendus, और Motilal Oswal Alts जैसे डोमेस्टिक मैनेजर्स ने अपने स्ट्रक्चर्ड क्रेडिट (structured credit) और यील्ड-फोकस्ड (yield-focused) फंड्स के लिए सफलतापूर्वक कैपिटल जुटा लिया है। यह बदलाव दिखाता है कि अंतरराष्ट्रीय प्लेयर्स के पीछे हटने से खाली हुई जगह को अब लोकल एक्सपर्टाइज भर रहा है।
रियल एस्टेट बना सबसे पसंदीदा सेक्टर
प्रॉपर्टी सेक्टर (property sector) में चल रही चिंताओं के बावजूद, रियल एस्टेट प्राइवेट क्रेडिट के लिए सबसे पसंदीदा जगह बनी हुई है। 2026 की पहली छमाही में कुल निवेश का 35% इसी सेक्टर में गया। इस लगातार डिमांड का एक बड़ा उदाहरण Kalpataru द्वारा जुटाया गया $176 मिलियन है, जो इस अवधि का सबसे बड़ा डील था। डेवलपर्स के लिए, प्राइवेट क्रेडिट एक महत्वपूर्ण सहारा है, खासकर तब जब बैंकों से फंडिंग मिलना मुश्किल हो या उन्हें अपने विस्तार (expansion) या अधिग्रहण (acquisition) की जरूरतों को पूरा करने के लिए फ्लेक्सिबल और कस्टमाइज्ड डील स्ट्रक्चर्स (customized deal structures) की जरूरत हो। इसके अलावा, हेल्थकेयर और फूड एंड बेवरेजेज जैसे सेक्टर्स ने भी 13% और 12% का महत्वपूर्ण हिस्सा आकर्षित किया।
कॉम्पिटिशन का माहौल और भविष्य का आउटलुक
प्राइवेट क्रेडिट वॉल्यूम्स का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि इंडस्ट्री एक बदलते कॉम्पिटिशन माहौल में खुद को कैसे ढालती है। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) का बैंकों को अधिग्रहण फाइनेंसिंग (acquisition financing) की अनुमति देना और बैंक क्रेडिट ग्रोथ (bank credit growth) में आई बढ़ोतरी, प्राइवेट क्रेडिट फंड्स के लिए नई चुनौतियां पैदा कर रही हैं। चूंकि प्राइवेट क्रेडिट अक्सर ब्रिज फाइनेंसिंग (bridge financing) के तौर पर इस्तेमाल होता है—यानी जब बैंक मदद नहीं कर पाते तब लेंडर्स आगे आते हैं—सस्ते बैंक लोन की आसान उपलब्धता प्राइवेट क्रेडिट प्रोवाइडर्स के लिए अवसर सीमित कर सकती है। इस सेक्टर पर नजर रखने वाले निवेशक इस बात पर गौर कर सकते हैं कि क्या प्राइवेट क्रेडिट फंड्स जोखिम भरे और ज्यादा कॉम्प्लेक्स प्रोजेक्ट्स की ओर अपना फोकस शिफ्ट करते हैं, जिनसे पारंपरिक बैंक अभी भी दूर रह सकते हैं। इन कॉम्पिटिटिव दबावों से निपटते हुए प्रॉफिट मार्जिन (profit margins) बनाए रखने की इन फंड्स की क्षमता आने वाले महीनों में मार्केट के लिए एक अहम फैक्टर होगी।
