PMS उद्योग की तूफानी रफ्तार! AUM पहुंचा ₹44.11 लाख करोड़, जुलाई में 11% की छलांग

BANKINGFINANCE
Whalesbook Logo
AuthorSaanvi Reddy|Published at:
PMS उद्योग की तूफानी रफ्तार! AUM पहुंचा ₹44.11 लाख करोड़, जुलाई में 11% की छलांग

भारत के पोर्टफोलियो मैनेजमेंट सर्विसेज (PMS) उद्योग ने जुलाई 2026 में शानदार प्रदर्शन किया है। कंपनी की एसेट्स अंडर मैनेजमेंट (AUM) **2%** बढ़कर **₹44.11 लाख करोड़** हो गई। यह बढ़ोतरी निवेशकों के भारी इनफ्लो और नए डिस्ट्रीब्यूटर्स की रिकॉर्ड संख्या के कारण हुई है।

AUM में 11% की जोरदार बढ़त

भारतीय पोर्टफोलियो मैनेजमेंट सर्विसेज (PMS) इंडस्ट्री ने जुलाई 2026 में अपनी ग्रोथ की रफ्तार जारी रखी। इस महीने इंडस्ट्री की एसेट्स अंडर मैनेजमेंट (AUM) 2% बढ़कर ₹44.11 लाख करोड़ तक पहुंच गई। पिछले साल की समान अवधि की तुलना में कुल AUM और क्लाइंट बेस, दोनों में 11% की वृद्धि दर्ज की गई है। इस दौरान क्लाइंट बेस भी बढ़कर लगभग 2.23 लाख खातों तक पहुंच गया।

डिस्ट्रीब्यूटर ग्रोथ और इनफ्लो पर एक नजर

इस विस्तार का एक मुख्य कारण डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क का मजबूत होना है। चालू फाइनेंशियल ईयर में जुलाई 2026 में सबसे ज्यादा नए डिस्ट्रीब्यूटर्स जुड़े। 1,226 इंडिविजुअल और 181 नॉन-इंडिविजुअल डिस्ट्रीब्यूटर्स ने PMS इकोसिस्टम में कदम रखा। इस बढ़ी हुई पहुंच ने सेक्टर में कैपिटल फ्लो को बढ़ाया है। जून में ₹3.55 लाख करोड़ के इनफ्लो की तुलना में, जुलाई में नेट इनफ्लो बढ़कर ₹4.66 लाख करोड़ हो गया।

डिस्क्रिशनरी सर्विसेज का दबदबा

डिस्क्रिशनरी सर्विसेज, जिनमें फंड मैनेजर क्लाइंट की ओर से निवेश का फैसला लेते हैं, सबसे लोकप्रिय सेगमेंट बनी हुई हैं। यह कैटेगरी कुल AUM का 84.7% और कुल क्लाइंट बेस का 95.5% है। विभिन्न सर्विस टाइप्स में, को-इन्वेस्टमेंट सर्विसेज ने 10.2% की मासिक ग्रोथ दर्ज की, इसके बाद एडवाइजरी और नॉन-डिस्क्रिशनरी सर्विसेज का नंबर आता है।

सेक्टर का भविष्य और संभावित जोखिम

हालांकि घरेलू निवेशकों (जो कुल AUM का 95% हैं) की भागीदारी मजबूत है, लेकिन भविष्य में कुछ फैक्टर इंडस्ट्री की परफॉर्मेंस को प्रभावित कर सकते हैं। बाजार की अस्थिरता (Volatility) एक बड़ा दबाव बना सकती है, जो पोर्टफोलियो में मौजूद एसेट्स की वैल्यूएशन को सीधे तौर पर प्रभावित करती है। इसके अलावा, महंगाई (Inflation) और बिजनेस के लिए इनपुट कॉस्ट में उतार-चढ़ाव जैसी मैक्रो इकोनॉमिक चुनौतियां एक अनिश्चित माहौल बना सकती हैं, जो संभावित निवेशकों की डिस्पोजेबल इनकम को प्रभावित कर सकती हैं।

एक और महत्वपूर्ण बात रेगुलेटरी एनवायरनमेंट पर नजर रखना है। भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) एसेट मैनेजमेंट स्पेस में पारदर्शिता, गवर्नेंस और स्टैंडर्डाइजेशन पर लगातार ध्यान केंद्रित कर रहा है। फर्म्स इन विकसित हो रही आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए अपने ऑपरेशनल मॉडल को एडजस्ट कर रही हैं, जिससे कंप्लायंस की जटिलता बढ़ जाती है। निवेशकों को APMI और SEBI से आगे के रेगुलेटरी अपडेट्स पर नजर रखनी चाहिए, साथ ही इंडस्ट्री की क्षमता पर भी ध्यान देना चाहिए कि वह अस्थिर बाजार परिस्थितियों के बीच इन ग्रोथ रेट्स को कैसे बनाए रखती है।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.