अगस्त 2026 में पारित MSME (Amendment) Act, 2026 के जरिए सरकार ने सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयों (PSUs) के लिए TReDS प्लेटफॉर्म का उपयोग अनिवार्य कर दिया है। इसका उद्देश्य छोटे व्यवसायों की पेमेंट में देरी को खत्म करना है, हालांकि NBFC नियमों की सख्ती और वैश्विक चुनौतियों से नई चुनौतियां भी खड़ी हो रही हैं।
भारत के सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (MSME) सेक्टर में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। अगस्त 2026 में संसद द्वारा पारित MSME (Amendment) Act, 2026 का मुख्य लक्ष्य छोटे सप्लायर्स को बड़ी कंपनियों के 'इंटरेस्ट-फ्री फाइनेंसर' बनने से बचाना है।
TReDS का अनिवार्य उपयोग
सबसे बड़ा बदलाव सेंट्रल पब्लिक सेक्टर एंटरप्राइजेज (CPSEs) के लिए आया है। अब इन इकाइयों को सभी प्रोक्योरमेंट सेटलमेंट अनिवार्य रूप से TReDS प्लेटफॉर्म के जरिए करने होंगे। इससे छोटी कंपनियों को अपने इनवॉइस के बदले तुरंत फंड मिल जाएगा और उन्हें खरीदार की लंबी पेमेंट साइकिल का इंतजार नहीं करना पड़ेगा।
RBI का डिजिटल विजन 2028
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) अपने 'Payments Vision 2028' के तहत बैंकिंग को अधिक आधुनिक बना रहा है। बैंक अब फिजिकल कोलैटरल (गिरवी) के बजाय कंपनियों के कैश फ्लो के आधार पर लोन देने पर जोर देंगे। इससे उन व्यवसायों को मदद मिलेगी जिनका क्रेडिट रिकॉर्ड 'थिन-फाइल' है।
चुनौतियों का साया
सुधारों के बावजूद कुछ अड़चनें कायम हैं:
- NBFC नियम: RBI द्वारा नॉन-बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनियों (NBFCs) के रिवॉल्विंग क्रेडिट प्रोडक्ट्स पर सख्ती बरतने की चर्चा है, जिससे वर्किंग कैपिटल मैनेज करने में दिक्कत आ सकती है।
- भू-राजनीतिक जोखिम: पश्चिम एशिया में अस्थिरता के कारण सप्लाई चेन प्रभावित हो रही है, जिससे एक्सपोर्ट करने वाले MSMEs की लागत बढ़ रही है।
आने वाली तिमाहियों में यह देखना अहम होगा कि बैंकिंग सिस्टम इन नए रिस्क-बेस्ड अंडरराइटिंग मानकों को छोटे उद्योगों की अनिश्चित कैश-फ्लो स्थिति के साथ कैसे संतुलित करता है।
