नए कर्जदार और NBFCs की सिलेक्टिविटी
भारत में नए-से-क्रेडिट (new-to-credit) व्यक्तियों को अपने प्लेटफॉर्म पर लाने में नॉन-बैंकिंग फाइनेंसियल कंपनीज़ (NBFCs) सबसे आगे हैं। रिपोर्ट्स बताती हैं कि NBFCs उन कस्टमर ग्रुप्स को सर्व करती हैं जिन्हें पारंपरिक बैंक, कड़े लेंडिंग नियमों के कारण, अक्सर ज्यादा रिस्की मानते हैं। भारत में क्रेडिट-एक्टिव लोगों की आबादी बढ़कर लगभग 29 करोड़ हो गई है, जिसमें 4.4 करोड़ नए कर्जदार शामिल हैं।
यह भी गौर करने वाली बात है कि इन नए कर्जदारों का टोटल ओरिजिनेशन (origination) में हिस्सा कम हुआ है। फरवरी 2026 तक के चार सालों में, नए कर्जदारों का हिस्सा 23.5% से घटकर 17.8% हो गया है। यह इस बात का संकेत है कि लेंडर्स (lenders) अब ज्यादा चुनिंदा हो रहे हैं। ट्रांसयूनियन सिबिल (TransUnion CIBIL) ब्यूरो ने भी जून 2025 तिमाही में नए-से-क्रेडिट (NTC) बरोअर शेयर में 16% की गिरावट दर्ज की है, जो एक साल पहले 18% था। लेंडर्स के इस सतर्क रवैये के कारण यह बदलाव आया है।
महिलाओं और ग्रामीण इलाकों से ग्रोथ
नए कर्जदारों के परिदृश्य को अनुकूल डेमोग्राफिक ट्रेंड्स (demographic trends) आकार दे रहे हैं। पहली बार लोन लेने वाली महिलाओं की भागीदारी पिछले पांच सालों में 33% से बढ़कर 41% हो गई है। प्रमुख लोन कैटेगरीज़ में अब सेमी-अर्बन और ग्रामीण इलाकों का हिस्सा आधे से ज्यादा है, जो एक व्यापक भौगोलिक पहुंच को दर्शाता है।
कंज्यूमर ड्यूरेबल (consumer durable) लोन सबसे आम पहला लोन प्रकार बना हुआ है, जो 32% खातों का हिस्सा है। गोल्ड (gold) और टू-व्हीलर (two-wheeler) लोन मिलकर पहली बार लोन लेने वाले खातों का लगभग 60% हैं। खास बात यह है कि इनमें से 67% नए कर्जदार एक साल के भीतर कम-जोखिम वाले क्रेडिट कैटेगरीज़ में चले गए, जो बेहतर रीपेमेंट (repayment) व्यवहार को दर्शाता है।
प्रतिस्पर्धा, रेगुलेशन और NBFCs
NBFCs एक डायनामिक मार्केट में काम करती हैं, जहाँ रेगुलेशन (regulation) लगातार बदल रहे हैं। डिपॉजिट्स (deposits) के माध्यम से सस्ती फंडिंग के कारण बैंकों को कम लेंडिंग रेट्स का फायदा मिलता है, और वे कॉर्पोरेट लेंडिंग (corporate lending) में हावी हैं। NBFCs, जो मार्केट से उधार लेने पर ज्यादा निर्भर करती हैं, अक्सर ज्यादा ब्याज दरें वसूलती हैं।
कॉर्पोरेट लेंडिंग में बैंकों ने अपनी मार्केट हिस्सेदारी वापस ली है, लेकिन NBFCs अभी भी कुछ रिटेल (retail) और MSME सेक्टरों में लीड करती हैं, खासकर छोटे लोन के मामले में, जहाँ बैंकों के 26% की तुलना में उनका मार्केट शेयर 45% है। NBFCs से बैंकों की तुलना में तेजी से बढ़ने की उम्मीद है, जिनके रिटेल सेगमेंट में सालाना 16-18% की वृद्धि का अनुमान है।
NBFCs के लिए चुनौतियां और जोखिम
NBFCs क्रेडिट तक पहुंच बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं, लेकिन कई चुनौतियों पर ध्यान देने की आवश्यकता है। कुल लोन में नए कर्जदारों के घटते शेयर से पता चलता है कि लेंडर्स ज्यादा सेलेक्टिव हो रहे हैं, जो वित्तीय समावेशन (financial inclusion) के लक्ष्यों को प्रभावित कर सकता है। एसेट क्वालिटी (asset quality) में सुधार दिख रहा है, लेकिन युवा कर्जदारों द्वारा लिए गए अनसिक्योर्ड लोन (unsecured loans) में शुरुआती तनाव देखा जा रहा है।
फंडिंग कॉस्ट (funding cost) एक बड़ी चुनौती है, जहाँ NBFCs को बैंकों की तुलना में अधिक लागत का सामना करना पड़ता है। इसके अलावा, अनसिक्योर्ड कंज्यूमर लोन और मार्केट से उधार लेने की बढ़ती लागतें भी चिंता का विषय हैं। सेक्टर को बढ़ते रेगुलेटरी स्क्रूटनी (regulatory scrutiny) और बदलते अनुपालन नियमों का भी सामना करना पड़ता है।
