दुनिया भर में चल रही भू-राजनीतिक उठापटक और देश की आर्थिक अनिश्चितताओं का असर अब नॉन-बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनियों (NBFCs) और हाउसिंग फाइनेंस कंपनियों (HFCs) पर दिखने लगा है। इंडिया रेटिंग्स के मुताबिक, इन कंपनियों के लिए बॉन्ड मार्केट में उधारी महंगी हो रही है। इसकी एक बड़ी वजह बैंकों द्वारा पॉलिसी रेट कट का धीरे-धीरे ग्राहकों तक पहुंचाना भी है। ऐसे में, NBFCs के लिए कर्ज की लागत में जल्द कमी की उम्मीद कम है। अब कंपनियां अपनी फंडिंग की जरूरतों को पूरा करने के लिए बड़े पैमाने पर बैंकों की ओर रुख कर रही हैं।
कंपनियों ने अब कैपिटल मार्केट पर अपनी निर्भरता कम कर दी है। इसके बजाय, वे बैंकों से मिलने वाले लोन पर ज्यादा भरोसा कर रही हैं, क्योंकि बैंकों से प्राइसिंग ज्यादा स्टेबल (stable) मिलती है। आपको बता दें कि NBFCs को बैंकों से मिलने वाले लोन में भारी इजाफा हो रहा है। फरवरी 2026 तक यह 19.1% बढ़ गया, जबकि एक साल पहले फरवरी 2025 में यह 6.4% था। यह दर्शाता है कि NBFCs अब बैंकों को अपना मुख्य फंडिंग सोर्स बना रही हैं। विदेश से आने वाला कर्ज (External Commercial Borrowings - ECBs) भी ग्लोबल अनिश्चितता और रुपये की अस्थिरता के कारण कम रहने की उम्मीद है। आंकड़े बताते हैं कि फाइनेंशियल ईयर 2027 (FY27) तक NBFCs के कुल कर्ज में बैंकों का हिस्सा बढ़कर 44-45% तक पहुंच सकता है। यह H2 FY26 के 43% की तुलना में एक महत्वपूर्ण उछाल है। वहीं, कैपिटल मार्केट से फंडिंग में नरमी देखी जा रही है।
हालांकि, बैंकों पर निर्भरता बढ़ने से कुछ नए खतरे भी पैदा हो रहे हैं। NBFCs अब बैंकों के एक छोटे ग्रुप पर ज्यादा डिपेंडेंट (dependent) हो गई हैं। बैंकों की अपनी फंडिंग कॉस्ट भी बढ़ रही है, क्योंकि उन्हें डिपॉजिट जुटाने के लिए ज्यादा कॉम्पिटिशन करना पड़ रहा है और बेंचमार्क रेट (MCLR) भी बढ़ाने पड़ रहे हैं। ऐसे में, अगर ग्लोबल टेंशन बढ़ती है और बैंकों से डिपॉजिट बाहर जाते हैं, तो वे NBFCs को लोन देने में ज्यादा सावधानी बरत सकते हैं और लोन की दरें बढ़ा सकते हैं। ECBs का कम होना करेंसी रिस्क तो कम कर देता है, लेकिन डोमेस्टिक बैंकों पर निर्भरता बढ़ा देता है। वहीं, ग्लोबल अनिश्चितता, जैसे कच्चे तेल के बढ़ते दाम और कमजोर पड़ता रुपया (लगभग 95 प्रति USD), लोन लेने वाले ग्राहकों की कमाई को प्रभावित कर सकता है, खासकर अनसिक्योर्ड लोन (unsecured loans) के सेगमेंट में। इससे लोन की क्वालिटी खराब होने का डर है। माइक्रोफाइनेंस और अनसिक्योर्ड बिजनेस लोन जैसे सेगमेंट्स में डिफॉल्ट (default) की कॉस्ट ऊंची रहने की संभावना है। NBFCs के लिए यह एक पुरानी समस्या भी है कि वे पब्लिक से डिपॉजिट स्वीकार नहीं कर सकतीं, इसलिए उनकी उधारी की लागत बैंकों से हमेशा ज्यादा रही है।
इन सब चुनौतियों के बावजूद, इंडिया रेटिंग्स ने NBFCs के लिए फाइनेंशियल ईयर 2026 (FY26) का आउटलुक 'न्यूट्रल' (Neutral) रखा है। लोन ग्रोथ 18.5% के आसपास रहने का अनुमान है। ICRA के मुताबिक, FY27 में प्रॉफिटेबिलिटी 2.3-2.5% के दायरे में रह सकती है। हालांकि, विश्लेषक (Analysts) चेतावनी दे रहे हैं कि नेट इंटरेस्ट मार्जिन (NIMs) अपने पीक (peak) पर हो सकते हैं और फंडिंग कॉस्ट बढ़ने से इनमें कमी आ सकती है। NBFCs के लिए आगे चलकर बढ़ती उधारी लागत, एसेट क्वालिटी (asset quality) को मैनेज करना और रेगुलेटरी बदलावों के साथ तालमेल बिठाना उनकी परफॉरमेंस के लिए अहम होगा।
