जुलाई 2026 के आंकड़ों के मुताबिक, भारतीय NBFCs के रिटेल लोन पोर्टफोलियो में **21.4%** की जोरदार बढ़त देखी गई है। इस तेजी के पीछे गोल्ड लोन में आया **68.5%** का उछाल मुख्य वजह है, लेकिन निवेशकों को अब RBI की सख्त होती निगरानी और सरकारी बैंकों से बढ़ती प्रतिस्पर्धा पर भी नजर रखनी होगी।
भारत के नॉन-बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनियों (NBFCs) का रिटेल सेक्टर में दबदबा लगातार बना हुआ है। जुलाई 2026 के ताजा डेटा के अनुसार, NBFCs का लोन पोर्टफोलियो 21.4% की दर से बढ़ा है, जो ओवरऑल क्रेडिट ग्रोथ (14.9%) से काफी ज्यादा है। इस ग्रोथ में गोल्ड लोन (68.5%) और कंज्यूमर ड्यूरेबल फाइनेंसिंग (51.5%) का योगदान सबसे बड़ा रहा है।
स्पेशलाइज्ड लेंडिंग की ओर बढ़ता कदम
NBFCs ने छोटे टिकट साइज के लोन में अपनी खास जगह बनाई है। डिजिटल-फर्स्ट अप्रोच और आसान लोन एक्सेस के कारण युवा और छोटे व्यापारी अब बैंकों के बजाय इन लेंडर्स को प्राथमिकता दे रहे हैं। ये कंपनियां अपने रिस्क असेसमेंट के लिए ऑल्टरनेटिव डेटा का उपयोग कर रही हैं, जिससे उन ग्राहकों तक पहुंच आसान हुई है जिन्हें पारंपरिक बैंक अब तक नहीं जोड़ पाए थे।
बैंकों के साथ दोस्ती और रिस्क
बैंक और NBFCs के बीच का रिश्ता काफी गहरा है। बैंक इन कंपनियों के लिए फंड जुटाने का सबसे बड़ा जरिया हैं। 'सिक्योरिटाइजेशन' (Securitization) के जरिए बैंक NBFCs के लोन पोर्टफोलियो खरीदकर अपने रिस्क को मैनेज करते हैं। हालांकि, सरकारी बैंकों के आक्रामक तेवर और RBI की रेवोलविंग क्रेडिट यानी 'फ्लेक्सी-लोन' पर संभावित सख्ती आने वाले समय में NBFCs के प्रॉफिट मार्जिन के लिए चुनौती बन सकती है।
निवेशकों को अब कंपनी की फंडिंग कॉस्ट और एसेट क्वालिटी पर बारीक नजर रखने की जरूरत है, क्योंकि लोन पोर्टफोलियो के मैच्योर होने के साथ ही क्रेडिट कॉस्ट का दबाव बढ़ सकता है।
