Microfinance Sector: कर्ज डिफॉल्ट बढ़कर **17.4%** पर पहुंचा, बदल रहा है भारतीय माइक्रोफाइनेंस का स्वरूप

BANKINGFINANCE
Whalesbook Logo
AuthorKaran Malhotra|Published at:
Microfinance Sector: कर्ज डिफॉल्ट बढ़कर **17.4%** पर पहुंचा, बदल रहा है भारतीय माइक्रोफाइनेंस का स्वरूप

भारतीय माइक्रोफाइनेंस सेक्टर में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। अब लोन की औसत टिकट साइज बढ़कर **₹62,962** हो गई है, जबकि कुल पोर्टफोलियो वैल्यू में **7.6%** की गिरावट आई है। RBI के सख्त नियमों और रेमिटेंस पैटर्न में बदलाव के चलते कर्ज न चुकाने वालों की संख्या बढ़कर **17.4%** हो गई है।

भारतीय माइक्रोफाइनेंस सेक्टर अब छोटे कर्ज देने के बजाय बड़े लोन साइज की ओर शिफ्ट हो रहा है। डेटा के मुताबिक, इंडस्ट्री का कुल पोर्टफोलियो 7.6% घट गया है, जबकि लोन की औसतन रकम ₹62,962 तक पहुंच गई है। यह बदलाव रेगुलेटरी सख्ती और रिस्क असेसमेंट में आए बड़े बदलावों का नतीजा है।

RBI के कड़े नियम और रेमिटेंस का असर

Reserve Bank of India (RBI) ने नए सुरक्षा नियम लागू किए हैं, जो एक ही समय में कई उधारदाताओं से कर्ज लेने पर रोक लगाते हैं। इस वजह से प्राइवेट बैंक और संस्थान ₹50,000 से कम के कर्ज सेगमेंट से पीछे हट रहे हैं। इसके साथ ही, रेमिटेंस (Remittance) पैटर्न में भी बदलाव आया है। हालांकि फाइनेंशियल ईयर 2026 में भारत को $110.47 बिलियन का रेमिटेंस मिला है, लेकिन गल्फ देशों से आने वाले पैसे की हिस्सेदारी घटकर 37.9% रह गई है, जो एक दशक पहले 46.7% थी। ग्रामीण परिवारों की लोन चुकाने की क्षमता पर इसका सीधा असर पड़ रहा है।

एसेट क्वालिटी और भविष्य की रणनीति

सेक्टर के लिए चिंता का विषय एसेट क्वालिटी है, जहां 180-days-past-due कैटेगरी में डिफॉल्ट 440 बेसिस पॉइंट्स बढ़कर 17.4% पर पहुंच गए हैं। पुरानी खराब बैलेंस शीट को ठीक करने के लिए अब लेंडर्स केवल क्रेडिट ब्यूरो रिपोर्ट पर निर्भर नहीं रह रहे हैं। अब कंपनियां UPI ट्रांजैक्शन और अकाउंट एग्रीगेटर फ्रेमवर्क का इस्तेमाल करके कर्जदारों की इनकम का रियल-टाइम असेसमेंट कर रही हैं।

मौजूदा समय में, माइक्रोफाइनेंस के लिए आय की पात्रता सीमा (Income Threshold) को ₹3 लाख प्रति वर्ष से बढ़ाकर स्टेट जीडीपी (GSDP) से जोड़ने पर भी बहस तेज हो गई है। साथ ही, Mudra Bank के पुनर्गठन और माइक्रोफाइनेंस संस्थानों के लिए उसे मुख्य रिफाइनेंसिंग बॉडी बनाने की मांग भी जोर पकड़ रही है। फिलहाल घरेलू स्तर पर औपचारिक क्रेडिट निर्भरता 51.2% है, ऐसे में आने वाली तिमाहियों में फंडिंग और पुराने बैड लोन्स का मैनेजमेंट सेक्टर की दिशा तय करेगा।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.