क्वालिटी में रिकॉर्ड सुधार, पर ग्रोथ की रफ्तार धीमी
सेक्टर की एसेट क्वालिटी (asset quality) नई ऊंचाइयों पर पहुंच गई है। मार्च 2026 तक 30-दिन की ओवरड्यू दर (30-day overdue rate) घटकर रिकॉर्ड 2.3% हो गई है। लोन की क्वालिटी में यह मजबूत प्रदर्शन तब आया है जब सेक्टर का कुल आउटस्टैंडिंग पोर्टफोलियो सालाना आधार पर 10% घटकर ₹3.38 लाख करोड़ रह गया। यह दिखाता है कि लेंडर्स आक्रामक ग्रोथ से हटकर वित्तीय स्थिरता को प्राथमिकता दे रहे हैं।
कर्ज़ बांटने में भारी गिरावट, पोर्टफोलियो में बदलाव
जनवरी-मार्च 2026 तिमाही में लोन डिस्बर्सल (loan disbursements) में भारी गिरावट आई। कुल डिस्बर्सल ₹79,622 करोड़ रहे, जो पिछले साल की तुलना में वॉल्यूम के हिसाब से 21% और वैल्यू के हिसाब से 7% कम हैं। इस धीमी रफ्तार से पता चलता है कि लेंडर्स जोखिम प्रबंधन (risk management) और क्रेडिट क्वालिटी (credit quality) को बेहतर बनाने की सावधानी भरी रणनीति अपना रहे हैं। इस गिरावट के बावजूद, एक्टिव लोन की संख्या 10.42 करोड़ पर बनी हुई है, जो उधारकर्ताओं की सक्रियता दिखाती है। एनबीएफसी-एमएफआई (NBFC-MFIs) ने बेहतर एसेट क्वालिटी दिखाई और कुल डिस्बर्सल का 47% हिस्सा इन्हीं का रहा।
वैल्यूएशन और सेक्टर की तुलना
हालांकि माइक्रोफाइनेंस इंडस्ट्री के लिए खास पी/ई रेश्यो (P/E ratio) सार्वजनिक रूप से ज़्यादा उपलब्ध नहीं हैं, लेकिन व्यापक भारतीय एनबीएफसी (NBFC) सेक्टर का वैल्यूएशन मिला-जुला है। उदाहरण के लिए, Bajaj Finance जैसे प्रमुख एनबीएफसी का पी/ई रेश्यो लगभग 31.52 है, और Shriram Finance का 22.89 है। माइक्रोफाइनेंस सेक्टर का फोकस तेजी से विस्तार करने के बजाय क्वालिटी पर होने के कारण, इसकी ग्रोथ रेट व्यापक एनबीएफसी मार्केट की तुलना में धीमी रहने की उम्मीद है, जो FY26 में एयूएम (AUM) में 12-18% ग्रोथ की उम्मीद कर रहा है। वहीं, बैंकिंग सेक्टर अलग स्थिति का सामना कर रहा है, जहाँ मार्च 2027 तक एनपीए (NPA) अनुपात 2.0-2.2% रहने और दिसंबर 2025 तक क्रेडिट विस्तार ₹200 लाख करोड़ से अधिक होने का अनुमान है।
खतरे और रेगुलेटरी असर
हालांकि, कुछ संरचनात्मक कमजोरियां बनी हुई हैं। बिहार, तमिलनाडु और उत्तर प्रदेश जैसे टॉप राज्य कुल पोर्टफोलियो का 56% हिस्सा बनाते हैं, जिससे कंसंट्रेशन रिस्क (concentration risk) पैदा होता है। पोर्टफोलियो में लगातार हो रही यह कमी एक बड़ी चिंता का विषय है, जो सेक्टर में लंबी अवधि की ग्रोथ की मुश्किलों का संकेत देती है। आरबीआई (RBI) की ओर से नए रेगुलेटरी बदलाव, जिसमें एनबीएफसी-एमएफआई के लिए एसेट थ्रेशोल्ड (asset threshold) को उनके पोर्टफोलियो का 60% करना शामिल है, गरीब लोगों की सेवा के मुख्य मिशन से भटकने का कारण बन सकते हैं। नए लोन में तेज गिरावट इस चिंता को भी बढ़ाती है कि लेंडर्स बहुत ज़्यादा प्रतिबंधात्मक हो रहे हैं, जो ग्रामीण इलाकों में आर्थिक गतिविधियों को बाधित कर सकता है। ऐतिहासिक रूप से, लोन डिस्बर्सल में तेज गिरावट ने सेक्टर में तनाव को जन्म दिया है, जैसे FY2025 में ग्रॉस लोन पोर्टफोलियो (GLP) में 13.9% की गिरावट। छोटे एमएफआई (MFIs) को बाहरी फंडिंग पर निर्भरता और संभावित लिक्विडिटी (liquidity) के मुद्दों से भी जोखिम का सामना करना पड़ रहा है।
भविष्य का नज़रिया: बेहतर तरीके से उधार देना
इंडस्ट्री के जानकार 'मापा हुआ ग्रोथ' (measured growth) के दौर की उम्मीद कर रहे हैं, जहाँ लेंडर्स एसेट क्वालिटी के साथ विस्तार को संतुलित करेंगे। सेक्टर वॉल्यूम-संचालित ग्रोथ (volume-driven growth) से हटकर पोर्टफोलियो क्वालिटी और लॉन्ग-टर्म रेजिलिएंस (long-term resilience) पर ज़्यादा ध्यान केंद्रित कर रहा है। अनुमान है कि माइक्रोफाइनेंस मार्केट 2034 तक 9.77% की औसत वार्षिक दर (CAGR) से बढ़कर USD 17.7 बिलियन तक पहुंच सकता है। हालांकि, यह ग्रोथ सावधानीपूर्वक लेंडिंग और बदलते रेगुलेशन और आर्थिक कारकों के अनुकूल होने पर निर्भर करती है। इकोनॉमिक सर्वे 2026 के अनुसार, मुख्य रणनीति 'ज़्यादा उधार देने' (lending more) के बजाय 'बेहतर उधार देने' (lending smarter) की ओर बढ़ रही है।
