8 तिमाहियों बाद सेक्टर में रिकवरी
8 तिमाहियों की लगातार गिरावट के बाद, इंडिया माइक्रोफाइनेंस सेक्टर ने आखिरकार वापसी के संकेत दिए हैं। CRIF High Mark की रिपोर्ट के मुताबिक, मार्च 2026 के अंत तक सेक्टर का ग्रॉस लोन पोर्टफोलियो (GLP) पिछले तिमाही की तुलना में 3.2% बढ़कर ₹3.31 ट्रिलियन तक पहुंच गया। इस पॉजिटिव ट्रेंड के पीछे ज्यादा लोन ओरिजिनेशन, एवरेज टिकट साइज में बढ़ोतरी और बेहतर एसेट क्वालिटी जैसे फैक्टर्स रहे।
NBFC-MFIs सबसे आगे, बैंकों का दबदबा कम
इस रिकवरी में नॉन-बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनी-माइक्रो फाइनेंस इंस्टीट्यूशन्स (NBFC-MFIs) सबसे आगे रहे। मार्च 2026 तक इनका पोर्टफोलियो आउटस्टैंडिंग 8.3% बढ़ा और मार्केट शेयर बढ़कर 43.7% हो गया, जो एक साल पहले 38.9% था। वहीं, बैंकों का इस सेक्टर में दबदबा कम हुआ है, उनका मार्केट शेयर घटकर 26.4% रह गया है (पहले 32.6% था) और उनका माइक्रोफाइनेंस पोर्टफोलियो 29.8% तक सिकुड़ गया है। हालांकि, स्मॉल फाइनेंस बैंक (SFBs) इस मामले में अच्छा प्रदर्शन कर रहे हैं।
लोन की रिकवरी में भी सुधार
लोन की रिकवरी (Repayment) में भी सुधार दिखा है। मार्च 2026 तक, 180 दिन या उससे ज्यादा समय से डूबे (ओवरड्यू) लोन का प्रतिशत घटकर 16.3% रह गया, जो दिसंबर 2025 में 17.3% था। इससे भी बड़ी बात यह है कि 1 से 180 दिन तक डूबे लोन की संख्या घटकर 2.6% रह गई, जो पिछली तिमाही में 4.4% थी। 31 से 180 दिन के बीच के ओवरड्यू लोन में भी सुधार हुआ है, जो मार्च 2026 में 2% पर आ गए, जबकि एक साल पहले ये 3.4% थे। यह बेहतर रीपेमेंट डिसिप्लिन सेक्टर की स्टेबिलिटी के लिए काफी अहम है।
नियामक बदलावों से नई चुनौतियाँ
नियामक (Regulatory) माहौल में भी बदलाव आया है। अब प्रति कर्जदार (Borrower) तीन या उससे कम लेंडर की लिमिट है, लेकिन कुछ कर्जदारों पर अभी भी एक से ज्यादा लेंडर का फोकस है। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) ने NBFC-MFIs के लिए क्वालिफाइंग एसेट थ्रेशोल्ड को 75% से घटाकर 60% कर दिया है। इससे उन्हें ऑपरेशनल फ्लेक्सिबिलिटी मिली है, लेकिन वित्तीय समावेशन (Financial Inclusion) पर फोकस कम होने और सबसे कमजोर वर्ग के कर्जदारों पर असर पड़ने की चिंताएं भी बढ़ गई हैं।
माइक्रोफाइनेंस सेक्टर के लिए अंदरूनी जोखिम
रिकवरी के बावजूद, कुछ फैक्टर्स पर ध्यान देना जरूरी है। NBFC-MFIs का बढ़ता दबदबा और बैंकों की घटती भूमिका एक स्ट्रक्चरल शिफ्ट दिखा रही है। इससे भविष्य में NBFC-MFIs के लिए फंडिग की चुनौती खड़ी हो सकती है। RBI की कुछ NBFCs के खिलाफ कार्रवाई और नए NPA क्लासिफिकेशन नियम (जो अब लोन की बजाय कर्जदार पर फोकस करते हैं) माइक्रोफाइनेंस और अनसिक्योर्ड लोन को प्रभावित कर सकते हैं। लगातार महंगाई या अचानक आर्थिक झटके ग्रामीण और निम्न-आय वर्ग के कर्जदारों पर दबाव डाल सकते हैं। फिलहाल, फाइनेंस और NBFC सेक्टर का एवरेज P/E रेश्यो करीब 27.28 है।
आगे क्या है उम्मीद?
आगे चलकर ग्रोथ स्थिर रहने की उम्मीद है। लेंडर्स पोर्टफोलियो की क्वालिटी और रेजिलिएंस पर ध्यान दे रहे हैं। उम्मीद है कि अगले 5-6 सालों में माइक्रोफाइनेंस सेक्टर का ग्रॉस लोन पोर्टफोलियो 15% की कंपाउंड एनुअल ग्रोथ रेट (CAGR) से बढ़कर करीब ₹10 ट्रिलियन तक पहुंच सकता है। हालांकि, यह ग्रोथ बदलते नियमों के हिसाब से ढलने, 'सिर्फ ज्यादा लोन देने' की बजाय 'बेहतर लोन देने' को प्राथमिकता देने और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की संवेदनशीलता को समझने पर निर्भर करेगी। आने वाला फाइनेंशियल ईयर इन सुधारों की सस्टेनेबिलिटी और रिस्क मैनेजमेंट के साथ विस्तार की क्षमता का आकलन करने के लिए महत्वपूर्ण होगा।
