11 तिमाहियों बाद सेक्टर में आई रिकवरी
लगातार 11 तिमाहियों की गिरावट और बड़े राइट-ऑफ के बाद, भारतीय माइक्रोफाइनेंस सेक्टर में ग्रोथ की वापसी हुई है। इक्विफैक्स इंडिया के आंकड़े बताते हैं कि मार्च अंत तक ग्रॉस लोन पोर्टफोलियो 5.3% बढ़कर ₹3.39 लाख करोड़ हो गया। यह रिकवरी एक अहम मोड़ साबित हो सकती है, क्योंकि सेक्टर की एसेट्स मार्च 2024 में ₹4.43 लाख करोड़ के पीक से तीन साल के लो दिसंबर 2025 में पहुंचने के बाद अब सुधर रही हैं। वहीं, 30+ दिन की डिफॉल्ट दर भी घटकर 2.3% पर आ गई है, जो पांच तिमाहियों में सबसे कम है। लेकिन यह रिकवरी एकसमान नहीं है, क्योंकि विभिन्न लेंडर ग्रुप अलग-अलग स्ट्रेटेजी अपना रहे हैं।
बैंकों और NBFCs की बढ़त, SFBs पिछड़ रहे
इस ग्रोथ में मुख्य रूप से नॉन-बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनी-माइक्रोफाइनेंस इंस्टीट्यूशन्स (NBFC-MFIs) और प्राइवेट बैंकों का बड़ा योगदान रहा है। NBFC-MFIs ने अपने माइक्रोफाइनेंस बिजनेस में तिमाही आधार पर 7.7% की वृद्धि दर्ज की और 42% मार्केट शेयर पर कब्जा कर लिया। प्राइवेट बैंकों ने इससे भी तेज 8.8% की ग्रोथ दिखाते हुए 26% शेयर हासिल किया। इसके विपरीत, स्मॉल फाइनेंस बैंक (SFBs) माइक्रोफाइनेंस से सक्रिय रूप से पीछे हट रहे हैं। मार्च अंत तक उनका कुल माइक्रोफाइनेंस पोर्टफोलियो पिछले क्वार्टर के ₹54,234 करोड़ से घटकर ₹50,725 करोड़ रह गया। SFBs अब क्रेडिट रिस्क को बेहतर ढंग से मैनेज करने और प्रॉफिट बढ़ाने के लिए व्हीकल और हाउसिंग फाइनेंस जैसे हाई-यील्ड वाले सिक्योरड लोन की ओर बढ़ रहे हैं। यह दर्शाता है कि वे अनसिक्योर्ड माइक्रो-लोन से दूर जाकर अपनी रिस्क और रिटर्न स्ट्रेटेजी पर फिर से विचार कर रहे हैं।
सेक्टर के सामने हैं चुनौतियाँ
इस ग्रोथ के बावजूद, माइक्रोफाइनेंस सेक्टर एक जटिल स्थिति का सामना कर रहा है। फाइनेंशियल ईयर 2025 के स्ट्रेस के कारण क्रेडिट कॉस्ट में भारी बढ़ोतरी हुई, जिससे NBFC-MFIs को घाटा हुआ। एसेट क्वालिटी सुधर रही है, लेकिन बरोअर्स की आय अभी भी कमजोर दिख रही है। नाबार्ड के एक सर्वे में यह बात सामने आई कि 2026 की शुरुआत में कम ग्रामीण परिवारों को आय में वृद्धि की उम्मीद थी, भले ही रूरल कंजम्पशन मजबूत बना रहा। सेक्टर का इतिहास मुश्किल वक्त से निकलने का रहा है, और पिछले संकटों ने ओवर-लेंडिंग और बरोअर्स द्वारा अत्यधिक कर्ज लेने जैसे जोखिमों को उजागर किया था। आरबीआई के नए नियम, जिसके तहत NBFC-MFIs को 60% एसेट्स को क्वालीफाइंग एसेट्स के तौर पर रखना होगा, उनके सबसे गरीब ग्राहकों की सेवा करने की क्षमता को प्रभावित कर सकते हैं। अनरेगुलेटेड लेंडिंग ऐप्स और फिनटेक कंपनियों से कड़ी प्रतिस्पर्धा भी पारंपरिक MFIs पर दबाव बना रही है।
गहरी चिंताएं और आगे की राह
SFBs का माइक्रोफाइनेंस से पीछे हटना अंतर्निहित जोखिमों का संकेत देता है। सिक्योरड लेंडिंग की ओर उनका झुकाव एसेट क्वालिटी को लेकर चिंताओं और अनसिक्योर्ड लेंडिंग में घटते प्रॉफिट के कारण इंडस्ट्री-वाइड रिस्क कम करने की कोशिश को दर्शाता है। मल्टीपल लोन वाले बरोअर्स से रीपेमेंट का जोखिम अभी भी बना हुआ है, खासकर उन फिनटेक लेंडर्स से जो शायद समान नियमों का पालन नहीं करते। नए नियम बरोअर एक्सपोजर को सीमित करते हैं, लेकिन बिहार माइक्रो फाइनेंस इंस्टीट्यूशन्स बिल 2026 जैसे स्थानीय नियम अभी भी चुनौतियाँ पैदा कर सकते हैं। सेक्टर की रिकवरी स्थिर बरोअर आय पर भी निर्भर करती है, जिसके संकेत मिले-जुले रहे हैं। उदाहरण के लिए, RBL Bank ने हाल ही में मजबूत प्रॉफिट ग्रोथ दर्ज की, लेकिन कुछ एनालिस्ट मार्जिन प्रेशर और क्रेडिट कॉस्ट को लेकर सतर्क हैं। इसका P/E रेश्यो लगभग 27x भी समान बैंकों और इसके अनुमानित वैल्यू की तुलना में काफी अधिक माना जा रहा है।
भविष्य का अनुमान: सावधानी भरी ग्रोथ
एक्सपर्ट्स का मानना है कि माइक्रोफाइनेंस सेक्टर में 'मापांक ग्रोथ' का दौर रहेगा, जिसमें विस्तार को सावधानीपूर्वक रिस्क मैनेजमेंट के साथ संतुलित करने पर जोर दिया जाएगा। अनुमान है कि डिजिटल टूल्स और फाइनेंशियल इंक्लूजन प्रयासों के सहारे यह सेक्टर 2034 तक 17.7 बिलियन डॉलर तक पहुंच सकता है। अब फोकस 'ज्यादा लेंडिंग' के बजाय 'स्मार्ट लेंडिंग' पर शिफ्ट हो रहा है। SFBs के पोर्टफोलियो में विविधता लाने जैसे वर्तमान स्ट्रेटेजिक बदलाव उद्योग में हो रहे परिवर्तन को दर्शाते हैं। निरंतर रिकवरी जिम्मेदार लेंडिंग, बरोअर डेट के प्रबंधन और आर्थिक बदलावों व नए रेगुलेशन के अनुकूल ढलने पर निर्भर करेगी।
