भले ही भारत के माइक्रोफाइनेंस सेक्टर ने संपत्ति की गुणवत्ता (Asset Quality) के मामले में शानदार प्रोग्रेस दिखाई हो, और डिफॉल्सी रेट मार्च 2026 तक रिकॉर्ड 2.3% पर आ गया हो, लेकिन उधारकर्ताओं (Borrowers) का एक बड़ा हिस्सा अभी भी दबाव में है।
इसकी वजह यह है कि करीब 15 लाख ऐसे लोग हैं जिन्होंने चार या उससे ज़्यादा माइक्रोफाइनेंस कर्जदाताओं से लोन लिया हुआ है।
ये उधारकर्ता कुल मिलाकर लगभग ₹15,800 करोड़ के कर्जदार हैं, और इनका औसत बकाया लोन ₹1 लाख से ज़्यादा है - जो कि आम माइक्रोफाइनेंस ग्राहक के बैलेंस से दोगुना से भी ज़्यादा है।
नए नियम और उनका असर
मध्य-2024 से लागू हुए इंडस्ट्री गार्डरेल्स (Industry Guardrails) के तहत, अब कर्जदाताओं को प्रति उधारकर्ता अधिकतम तीन माइक्रोफाइनेंस संस्थानों (Microfinance Institutions) तक सीमित कर दिया गया है।
इस नियम के कारण इन लोगों के लिए नए क्रेडिट (New Credit) तक पहुंच काफी मुश्किल हो गई है, जिससे उनके मौजूदा लोन चुकाने का दबाव और बढ़ गया है।
चिंताजनक आंकड़े
जहां सेक्टर का कुल 30-दिन का ओवरड्यू रेट (Overdue Rate) मार्च 2026 तक रिकॉर्ड 2.3% तक गिर गया, और NBFC-MFIs का पोर्टफोलियो एट रिस्क (Portfolio at Risk - PAR) 1-180 दिन के लिए दिसंबर 2025 तक सुधर कर 3.9% हो गया, वहीं मल्टीपल लोन वाले उधारकर्ताओं के बीच संकट बना हुआ है।
इन उधारकर्ताओं द्वारा बकाया ₹15,800 करोड़ के पोर्टफोलियो का करीब 10% लोन 30 से 180 दिनों से ज़्यादा समय से ओवरड्यू है।
मार्च 2025 तक, तीन से ज़्यादा कर्जदाताओं से लोन लेने वाले उधारकर्ताओं का हिस्सा अनुमानित रूप से NBFC-MFI उधारकर्ताओं का 17% रह गया था। कुछ रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह आंकड़ा सितंबर 2025 तक 28 लाख तक पहुंच गया था।
हालांकि, कुछ खास इलाकों में लेट-स्टेज डिफॉल्सी (Late-stage Delinquencies - PAR 180+) के मामले बढ़ रहे हैं, जो लंबे समय से बकाया खातों को नियमित करने में लगातार चुनौतियों का संकेत दे रहे हैं।
सेक्टर की स्थिति और भविष्य
NBFC-माइक्रोफाइनेंस इंस्टीट्यूशंस (NBFC-MFIs) की बाजार हिस्सेदारी सबसे ज़्यादा है, जो दिसंबर 2025 तक कुल पोर्टफोलियो का लगभग 42.1% थी।
सेक्टर अब आक्रामक वॉल्यूम-आधारित ग्रोथ (Volume-driven Growth) से हटकर 'स्मार्ट लेंडिंग' (Smarter Lending) और बैलेंस शीट की स्थिरता (Balance Sheet Stability) पर ज़्यादा ध्यान केंद्रित कर रहा है।
बिहार, तमिलनाडु और उत्तर प्रदेश जैसे प्रमुख राज्य कुल पोर्टफोलियो का एक बड़ा हिस्सा रखते हैं, जिससे स्थानीय तनाव का प्रभाव और बढ़ सकता है।
भारतीय माइक्रोफाइनेंस सेक्टर पहले भी संकट झेल चुका है, खासकर 2010 में आंध्र प्रदेश की स्थिति, जो आक्रामक लेंडिंग और ओवर-बोर्रोइंग के कारण हुई थी।
RBI ने घरेलू आय की सीमाएं ग्रामीण उधारकर्ताओं के लिए ₹1.25 लाख और शहरी/अर्ध-शहरी उधारकर्ताओं के लिए ₹2 लाख तक बढ़ा दी हैं, जिससे योग्य व्यक्तियों के लिए पहुंच का विस्तार हो सकता है।
एनालिस्ट्स की राय और भविष्य का अनुमान
एनालिस्ट्स (Analysts) सतर्क बने हुए हैं। CARE रेटिंग्स ने FY2026 के लिए सेक्टर की एसेट क्वालिटी और कमाई को लेकर 'नेगेटिव आउटलुक' (Negative Outlook) दिया है, जबकि ICRA ने लगातार एसेट क्वालिटी चुनौतियों का ज़िक्र किया है।
NBFC-MFIs के लिए क्रेडिट कॉस्ट (Credit Costs) तेज़ी से बढ़ी है।
सेक्टर में 'मापा हुआ विकास' (Measured Growth) देखने की उम्मीद है, जिसमें तेज़ी से विस्तार के बजाय एसेट क्वालिटी और वित्तीय स्थिरता पर ज़ोर दिया जाएगा।
एनालिस्ट्स का अनुमान है कि FY2026-28 के दौरान कमाई में रिकवरी और एसेट्स अंडर मैनेजमेंट (Assets Under Management - AUM) की मॉडरेट कंपाउंड एनुअल ग्रोथ रेट (CAGR) देखने को मिलेगी।
भविष्य के अनुमानों के अनुसार, यह मार्केट लगभग 9.77% CAGR से बढ़कर 2034 तक 17.7 बिलियन डॉलर तक पहुंच सकता है, बशर्ते कि यह बदलते नियमों और आर्थिक परिस्थितियों के साथ लगातार तालमेल बिठाता रहे।
