Sun Pharma Deal से भारत का M&A मार्केट ₹27.9 अरब पर पहुंचा, 4 साल का रिकॉर्ड टूटा

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AuthorSaanvi Reddy|Published at:
Sun Pharma Deal से भारत का M&A मार्केट ₹27.9 अरब पर पहुंचा, 4 साल का रिकॉर्ड टूटा

साल 2026 की दूसरी तिमाही (अप्रैल-जून) में भारत का मर्जर और अधिग्रहण (M&A) मार्केट चार साल के उच्चतम स्तर पर पहुंच गया है। कुल डील वैल्यू **₹27.9 अरब** रही, जिसमें विदेशी सौदों का बोलबाला रहा। हालांकि, डील की संख्या घटी है, लेकिन अब बड़ी कंपनियों के बीच बड़ी स्ट्रैटेजिक डील (strategic deal) पर फोकस बढ़ा है, खासकर फार्मा और मैन्युफैक्चरिंग जैसे सेक्टर में।

सन फार्मास्युटिकल इंडस्ट्रीज का $11.8 अरब का अधिग्रहण

इस तिमाही की सबसे बड़ी डील सन फार्मास्युटिकल इंडस्ट्रीज (Sun Pharmaceutical Industries) का $11.8 अरब में ऑर्गनन एंड कंपनी (Organon & Co.) का अधिग्रहण रही। यह डील अकेले ही तिमाही के कुल वैल्यू का एक बड़ा हिस्सा रही और किसी भारतीय फार्मा कंपनी द्वारा अब तक का सबसे बड़ा विदेशी अधिग्रहण है। शेयरधारकों के लिए, यह कंपनी के कैपिटल एलोकेशन (capital allocation) में एक अहम बदलाव का संकेत है। सन फार्मा इस बड़े अधिग्रहण के जरिए अपनी ग्लोबल पहुंच और प्रोडक्ट पोर्टफोलियो को बढ़ाना चाहती है। हालांकि, इस तरह के बड़े विदेशी सौदों में नए ग्लोबल ऑपरेशन्स को इंटीग्रेट करने, कर्ज का बोझ बढ़ने और विभिन्न देशों के रेगुलेटरी माहौल को समझने जैसी चुनौतियाँ भी होती हैं।

सेक्टर की चाल और मार्केट की गतिशीलता

कुल डील वैल्यू में विदेशी सौदों का दबदबा रहा, जो कि 84% रहे। वहीं, घरेलू सौदों की संख्या स्थिर रही और कुल ट्रांजैक्शन्स का 64% रही। इससे पता चलता है कि बड़ी कंपनियां अंतर्राष्ट्रीय विस्तार पर ध्यान दे रही हैं, जबकि छोटी घरेलू कंपनियां अभी भी मार्केट शेयर हासिल करने के लिए M&A में सक्रिय हैं।

सेक्टर की बात करें तो हेल्थकेयर, फार्मास्युटिकल्स और बायोटेक्नोलॉजी ने वैल्यू के मामले में सबसे ज्यादा हिस्सेदारी की। इसके अलावा, मैन्युफैक्चरिंग और इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टरों ने भी महत्वपूर्ण पूंजी आकर्षित की, जो औद्योगिक विकास की व्यापक प्रवृत्ति को दर्शाता है।

दूसरी ओर, प्राइवेट इक्विटी (private equity) की सक्रियता में कमी देखी गई, डील वैल्यू पिछले तिमाही की तुलना में 22% गिरी। हालांकि, एवरेज डील साइज (average deal size) बढ़ने के संकेत हैं, जिससे पता चलता है कि प्राइवेट इक्विटी फर्म बड़ी और स्थापित कंपनियों में निवेश करने को प्राथमिकता दे रही हैं।

निवेशकों के लिए, यह देखना अहम होगा कि कंपनियां इन बहु-अरब डॉलर के विस्तार से जुड़े कर्ज और इंटीग्रेशन के खर्चों का प्रबंधन कैसे करती हैं। इन सौदों की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि कंपनियां आने वाले वर्षों में अपेक्षित प्रॉफिट मार्जिन (profit margin) और सिनर्जी (synergies) हासिल कर पाती हैं या नहीं। शेयरधारकों को मैनेजमेंट की कमेंट्री पर नज़र रखनी चाहिए कि वे इन अंतर्राष्ट्रीय अधिग्रहणों के इंटीग्रेशन, कैश फ्लो पर असर और भविष्य की डिविडेंड पॉलिसी (dividend policy) या कर्ज कम करने की योजनाओं में बदलाव को कैसे देखते हैं।

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