यह एक ऐसी समस्या है जो भारत के 7 करोड़ MSMEs के विकास को लगातार रोक रही है। आधे से ज़्यादा छोटे कारोबारी, यानी 30% से भी अधिक, अपनी सबसे बड़ी बाधा फाइनेंस को मानते हैं। मजबूरी में वे अक्सर ऊँचे ब्याज दरों पर अनौपचारिक लोन लेने को मजबूर हो जाते हैं।
यह ₹25-30 लाख करोड़ का क्रेडिट गैप सिर्फ एक आंकड़ा नहीं, बल्कि ऐसे हजारों व्यवसायों की कहानी है जो सरकारी योजनाओं जैसे MUDRA या क्रेडिट गारंटी के बावजूद औपचारिक लोन से वंचित हैं। आंकड़ों के मुताबिक, 40% से ज़्यादा रजिस्टर्ड MSMEs को कभी औपचारिक लोन मिला ही नहीं, क्योंकि उनके पास क्रेडिट हिस्ट्री या गिरवी रखने के लिए कुछ नहीं होता। डिजिटल लेंडर्स ने लोन अप्रूवल को लगभग 35% तक तेज़ किया है, पर वे भी उन व्यवसायों तक पूरी तरह नहीं पहुँच पाए हैं जिनका डिजिटल रिकॉर्ड या कागजात कमजोर हैं।
बैंक, नॉन-बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनियाँ (NBFCs) और फिनटेक फर्म्स मिलकर इस गैप को भरने की कोशिश कर रहे हैं। NBFCs MSME लेंडिंग में ज़बरदस्त 21.2% से 42.4% तक की ग्रोथ दिखा रहे हैं, जो बैंकों की 12.7% से 12.4% की ग्रोथ से कहीं ज़्यादा है। फिनटेक कंपनियाँ तो 48 घंटे में लोन अप्रूव कर देती हैं, लेकिन इस तेज़ रफ़्तार ग्रोथ के साथ लोन की क्वालिटी पर भी सवाल उठ रहे हैं। खासकर अनसिक्योर्ड MSME लोन में लेट पेमेंट्स बढ़ रहे हैं। वहीं, भारत का कॉर्पोरेट बॉन्ड मार्केट ₹53 ट्रिलियन तक पहुँचने वाला है, पर इसमें भी 80% से ज़्यादा हिस्सा टॉप-रेटेड कंपनियों (AA-रेटेड और उससे ऊपर) का है। छोटे व्यवसायों के लिए यहाँ से कैपिटल जुटाना अभी भी टेढ़ी खीर है।
असली चिंता यह है कि डिजिटल प्रगति कहीं गहरी स्ट्रक्चरल प्रॉब्लम्स को छिपा न दे। 2016 के बाद हुए बैंकिंग रिफॉर्म्स ने लेंडर्स को छोटे बिज़नेसेज के प्रति और भी सावधान कर दिया है। NBFCs ने कुछ हद तक कमी पूरी की है, लेकिन उनके छोटे बैलेंस शीट सभी MSME की ज़रूरतों को पूरा नहीं कर सकते। अनसिक्योर्ड लेंडिंग में बढ़ते लेट पेमेंट्स यह दिखाते हैं कि सिर्फ डेटा और स्पीड से आगे बढ़कर, इन कमज़ोर बिज़नेसेज के लिए मज़बूत रिस्क कंट्रोल की ज़रूरत है। सरकारी क्रेडिट गारंटी मददगार हैं, पर प्रैक्टिकल लेवल पर दिक्कतें हैं और ये 'न्यू-टू-क्रेडिट' ग्रुप तक ठीक से नहीं पहुँच पातीं। नतीजतन, एक बँटा हुआ क्रेडिट मार्केट बन रहा है - एक डिजिटल रिकॉर्ड वालों के लिए, और एक बड़ा ग्रुप जो आज भी अनौपचारिक लोन या 16-23% तक के ऊँचे ब्याज वाले प्राइवेट लेंडर्स पर निर्भर है। भारत का क्रेडिट-टू-GDP रेश्यो सिर्फ 58% है, जो कई देशों से कम है, और यह साफ बताता है कि फॉर्मल क्रेडिट एक्सेस को कितना बढ़ाना होगा।
फिलहाल, भारत की इकोनॉमी 8.2% की रियल GDP ग्रोथ के साथ मज़बूत दिख रही है, और महंगाई भी घट रही है। हालाँकि, एक UN रिपोर्ट के मुताबिक, बाहरी कारणों से FY27 तक ग्रोथ घटकर 6.4% रह सकती है। बैंक और फाइनेंशियल फर्म्स अब 'रिस्क-एवर्स ग्रोथ' पर ज़ोर दे रहे हैं, यानी एसेट क्वालिटी और मुनाफे पर फोकस कर रहे हैं, न कि तेज़ी से एक्सपेंशन पर। लेंडर्स सिक्योरड लोन की तरफ़ ज़्यादा झुक रहे हैं। भले ही डिजिटल प्रोसेसिंग और बेहतर असेसमेंट से चीज़ें तेज़ हुई हैं, पर कोलैटरल की ज़रूरत, लिमिटेड क्रेडिट हिस्ट्री और कागज़ी कार्रवाई की मुश्किलें आज भी कई MSMEs के लिए बड़ी चुनौतियाँ हैं। लगातार और समावेशी विकास के लिए सिर्फ डिजिटल टूल्स काफी नहीं होंगे। हमें क्रेडिट को एक ज़रूरी इंफ्रास्ट्रक्चर की तरह देखना होगा, कोलैटरल पर निर्भरता कम कर कैश फ्लो का बेहतर आकलन करना होगा, और ऐसे रेगुलेशन बनाने होंगे जो 'न्यू-टू-क्रेडिट' बिज़नेसेज के लिए कंट्रोल्ड रिस्क-टेकिंग को बढ़ावा दें। कॉर्पोरेट बॉन्ड मार्केट के विस्तार में भी ऐसे तरीके शामिल करने होंगे जिनसे सिर्फ टॉप-टियर ही नहीं, बल्कि कम-रेटेड फर्म्स भी कैपिटल तक पहुँच सकें।
