बैंकिंग सिस्टम में **₹11.16 लाख करोड़** की भारी लिक्विडिटी का फायदा उठाने के लिए भारतीय कंपनियां बॉन्ड जारी कर रही हैं। कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों के बीच, कंपनियों को डर है कि RBI जल्द ही ब्याज दरें बढ़ा सकता है, जिससे भविष्य में कर्ज लेना महंगा हो जाएगा।
भारतीय कॉर्पोरेट जगत इस समय घरेलू बॉन्ड बाजार से बड़ी मात्रा में पूंजी जुटाने में जुटा है। इसका मुख्य मकसद यह है कि भविष्य में संभावित रेट हाइक (Rate Hike) से पहले कम दरों पर पैसा सुरक्षित कर लिया जाए। बैंकिंग सिस्टम में मौजूद ₹11.16 लाख करोड़ के अधिशेष का फायदा उठाने के लिए कंपनियां काफी सक्रिय नजर आ रही हैं।
बॉन्ड रश की असली वजह
बाजार में नकदी का अंबार लगा है और ओवरनाइट रेट्स 4% से 5% के बीच बने हुए हैं, जिससे बैंकों के पास बेहतर रिटर्न के विकल्प सीमित हैं। ऐसे में बैंक कॉर्पोरेट बॉन्ड्स के बड़े खरीदार बनकर उभरे हैं। Muthoot Fincorp और REC जैसी बड़ी वित्तीय कंपनियां इस ट्रेंड की अगुवाई कर रही हैं। वर्तमान में, अच्छी रेटिंग वाली कंपनियों के 5-वर्षीय बॉन्ड पर 7.47% के कूपन रेट्स मिल रहे हैं, जो बैंकों के लिए रिस्क-फ्री रेट्स से बेहतर विकल्प हैं।
महंगाई और रिस्क का कनेक्शन
इस जल्दबाजी के पीछे सबसे बड़ा डर महंगाई का है। ग्लोबल बाजार में ब्रेंट क्रूड ऑयल $100 प्रति बैरल के स्तर को पार कर चुका है। ऊर्जा की बढ़ती कीमतों से देश में आयातित महंगाई (Imported Inflation) का खतरा बढ़ गया है, जिससे RBI पर ब्याज दरें बढ़ाने का दबाव बन सकता है। फिलहाल, 10-वर्षीय सरकारी बॉन्ड यील्ड करीब 6.97% के आसपास ट्रेड कर रही है, लेकिन कंपनियों को डर है कि आने वाले समय में कर्ज काफी महंगा हो सकता है।
निवेशकों के लिए क्या है खास?
इन्वेस्टर्स को अब यह देखना होगा कि RBI अपनी लिक्विडिटी मैनेज करने के लिए 'वेरिएबल रेट रिवर्स रेपो' (Variable Rate Reverse Repo) ऑपरेशन कैसे चलाता है। साथ ही, वेस्ट एशिया में जारी जियोपॉलिटिकल तनाव कच्चे तेल की कीमतों को और ऊपर ले जा सकता है, जिससे कंपनियों के लिए सस्ता कर्ज लेने की खिड़की समय से पहले बंद हो सकती है। अगली कुछ तिमाहियों में कंपनियों की डेट मैनेजमेंट क्षमता ही उनका असली परफॉर्मेंस मीटर होगी।
