भारतीय घरों में कर्ज लेने का ट्रेंड बदल गया है। अब लोग घर खरीदने के बजाय पर्सनल खर्चों के लिए लोन ज्यादा ले रहे हैं, जो कुल देनदारियों का **34%** पहुंच गया है। यह ट्रेंड बचत के लिए खतरा है, लेकिन NBFCs के लिए कमाई का नया जरिया बन गया है।
भारतीय अर्थव्यवस्था में कर्ज लेने का तौर-तरीका बदल रहा है। अब लोग लंबी अवधि की संपत्ति (Assets) बनाने के बजाय अपनी खपत (Consumption) पूरी करने के लिए लोन ले रहे हैं। साल 2020 के फाइनेंशियल ईयर में पर्सनल लोन का हिस्सा 29% था, जो अब बढ़कर 34% हो गया है। इसके उलट, हाउसिंग लोन, जिसे निवेश माना जाता है, वह 30% से घटकर 27% रह गया है। यह बदलाव घरों की लॉन्ग-टर्म फाइनेंशियल स्टेबिलिटी के लिए चिंता का विषय हो सकता है।
इकोनॉमी पर दबाव
देश का कुल हाउसिंग कर्ज इकोनॉमी के साइज के मुकाबले 49% पर पहुंच गया है, जो कि अन्य उभरते बाजारों के 45% के औसत से काफी ज्यादा है। वहीं, फाइनेंशियल सेविंग्स का स्तर अपने ऐतिहासिक औसत 7.9% से नीचे गिर गया है। इसका मतलब है कि परिवारों के पास अब मुश्किल समय के लिए कम वित्तीय बफर (Financial Buffer) बचा है।
NBFCs के लिए अवसर
अनसिक्योर्ड लोन की बढ़ती मांग से नॉन-बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनियों (NBFCs) को बड़ा फायदा हो रहा है। UBS के अनुमानों के मुताबिक, इन उधारदाताओं के पर्सनल लोन पोर्टफोलियो में 30% तक की उछाल आ सकती है। बैंकिंग सिस्टम में मौजूद $144 बिलियन की लिक्विडिटी के कारण लेंडर्स को कम लागत पर पैसा मिल रहा है, जिससे वे अपने लोन बुक का तेजी से विस्तार कर रहे हैं।
निवेशकों को क्या देखना चाहिए?
तेजी के बावजूद, लोन क्वालिटी सबसे बड़ा जोखिम है। अगर लोगों की आय कर्ज की किस्तों के मुकाबले नहीं बढ़ती, तो डिफॉल्ट का खतरा बढ़ सकता है। निवेशकों को यह नजर रखनी होगी कि लेंडर्स अपनी क्रेडिट स्टैंडर्ड्स को कैसे मैनेज करते हैं और आने वाली तिमाही नतीजों में ओवरड्यू लोन (Overdue Loans) की स्थिति क्या रहती है।
