भारत में गोल्ड-बैक्ड (Gold-Backed) लोन का बाज़ार ज़बरदस्त रफ़्तार से आगे बढ़ रहा है। नॉन-बैंकिंग फाइनेंसियल कंपनियों (NBFCs) के आउटस्टैंडिंग (Outstanding) लोन जून 2026 तक **₹3.41 लाख करोड़** के पार पहुंच गए हैं, जो पिछले साल के मुकाबले **69.3%** की ज़बरदस्त ग्रोथ दिखाता है। सोने की बढ़ती कीमतें और ग्रामीण इलाकों से बढ़ती मांग इस तेज़ी के मुख्य कारण हैं, लेकिन अच्छी बात यह है कि खराब कर्ज़ (Bad Loans) भी रिकॉर्ड निचले स्तर पर आ गए हैं।
गोल्ड लोन में कैसे आई इतनी तेज़ी?
भारत का गोल्ड लोन बाज़ार इस वक्त ज़बरदस्त एक्टिविटी का गवाह बन रहा है। नॉन-बैंकिंग फाइनेंसियल कंपनियों (NBFCs) द्वारा दिए जाने वाले गोल्ड लोन में पिछले साल के मुकाबले 69.3% की बम्पर ग्रोथ दर्ज की गई है। जून 2026 तक, गोल्ड ज्वैलरी के बदले दिए गए लोन का कुल बकाया ₹3.41 लाख करोड़ से ₹3.42 लाख करोड़ तक पहुंच गया है। इस ग्रोथ ने भारत में रिटेल क्रेडिट (Retail Credit) के नक़्शे को पूरी तरह से बदल दिया है, जहाँ बैंक (Banks) और NBFCs दोनों के लिए गोल्ड-बैक्ड लोन सबसे तेज़ी से बढ़ते हुए सेगमेंट में से एक बन गए हैं।
एसेट क्वालिटी और कोलैटरल (Collateral) की मज़बूती
लोन बुक के आकार में इस तेज़ी के बावजूद, सेक्टर में खराब कर्ज़ (Bad Loans) में आश्चर्यजनक गिरावट देखी गई है। NBFCs के लिए, ग्रॉस नॉन-परफॉर्मिंग एसेट (GNPA) रेशियो पिछले तीन सालों में 2.32% से घटकर सिर्फ 0.81% रह गया है। वहीं, शेड्यूल्ड कमर्शियल बैंक्स (Scheduled Commercial Banks) में यह रेशियो 0.19% से घटकर 0.12% हो गया है। इस ट्रेंड का सबसे बड़ा कारण सोने की कीमतों में लगातार आ रही तेज़ी है। चूंकि कोलैटरल, यानी सोने के गहने, की वैल्यू बढ़ी है, इसलिए लोन-टू-वैल्यू (LTV) का कुशन मज़बूत बना हुआ है। इससे लेंडर्स (Lenders) के लिए डिफॉल्ट (Default) की स्थिति में पैसा वसूल करना आसान हो गया है।
यह विस्तार ग्रामीण और कम सेवा वाले बाज़ारों के लिए क्रेडिट (Credit) को औपचारिक रूप देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। यह माइक्रो, स्मॉल और मीडियम एंटरप्राइजेज़ (MSMEs) को तुरंत, कोलैटरलाइज़्ड कैश (Collateralized Cash) मुहैया कराता है, जो अक्सर महंगे और अनऑर्गनाइज़्ड (Unorganized) लेंडर्स का एक ज़रूरी विकल्प बनता है। साउथ इंडिया में इस बिज़नेस का कंसंट्रेशन (Concentration) अभी भी ज़्यादा है, जहाँ तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में पब्लिक सेक्टर बैंक्स (Public Sector Banks) के बीच सबसे ज़्यादा एक्सपोजर (Exposure) देखा गया है।
नए RBI रेगुलेशन का असर
यह सुनिश्चित करने के लिए कि इस तेज़ ग्रोथ से कोई सिस्टमैटिक अस्थिरता (Systemic Instability) न पैदा हो, रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) ने 1 अप्रैल, 2026 से 'Lending Against Gold and Silver Collateral' Directions, 2025 लागू किया है। इस रेगुलेटरी फ्रेमवर्क (Regulatory Framework) ने पूरे इंडस्ट्री में वैल्यूएशन स्टैंडर्ड्स (Valuation Standards), ऑक्शन नोटिस पीरियड (Auction Notice Periods) और LTV लिमिट्स (LTV Limits) को हार्मोनाइज़ (Harmonize) किया है। लेंडर्स को IBJA (India Bullion and Jewellers Association) की कीमतों के आधार पर स्टैंडर्डाइज़्ड गोल्ड वैल्यूएशन (Standardized Gold Valuation) और बड़े लोन के लिए सख़्त LTV कैप्स (LTV Caps) का इस्तेमाल करने के लिए मज़बूर करके, रेगुलेटर अत्यधिक जोखिम लेने से रोकने की कोशिश कर रहा है।
जोखिम और निवेशकों के लिए ज़रूरी बातें
हालांकि यह सेक्टर तेज़ी से बढ़ रहा है, निवेशकों को संभावित जोखिमों पर कड़ी नज़र रखनी चाहिए। सबसे बड़ा खतरा इस बिज़नेस मॉडल का सोने की कीमतों के प्रति सेंसिटिव (Sensitive) होना है। सोने की कीमतों में आई कोई भी तेज़ और लगातार गिरावट कोलैटरल कुशन (Collateral Cushion) को कम कर देगी, जिससे डिफॉल्ट रेट्स (Delinquency Rates) में तेज़ी आ सकती है। इसके अलावा, RBI थर्ड-पार्टी सोर्सिंग (Third-Party Sourcing) और ड्यू डिलिजेंस (Due Diligence) को लेकर सतर्क है। जो लेंडर्स आक्रामक रूप से अपने पोर्टफोलियो (Portfolio) का विस्तार कर रहे हैं, उन्हें यह सुनिश्चित करना होगा कि उनकी मूल्यांकन प्रक्रियाएं (Appraisal Processes) नए 2025 कंप्लायंस स्टैंडर्ड्स (Compliance Standards) को पूरा करने के लिए काफ़ी मज़बूत हों। निवेशकों को यह ट्रैक करना चाहिए कि कंपनियां आक्रामक मार्केट शेयर हासिल करने और नए रेगुलेटरी रेजीम (Regulatory Regime) के तहत सख़्त एसेट क्वालिटी (Asset Quality) बनाए रखने की ज़रूरत के बीच कैसे संतुलन बना रही हैं।
