जुलाई **2026** तक भारत में नॉन-बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनियों (NBFCs) का गोल्ड लोन पोर्टफोलियो **68.5%** बढ़कर **₹3.54 लाख करोड़** के पार पहुंच गया है। सोने की बढ़ती कीमतों के बीच अब निवेशक RBI के नए नियमों और एसेट क्वालिटी पर पैनी नजर रख रहे हैं।
भारत में गोल्ड लोन सेक्टर तेजी से विस्तार कर रहा है। जुलाई 2026 के आंकड़ों के अनुसार, NBFCs का कुल आउटस्टैंडिंग क्रेडिट ₹3.54 लाख करोड़ हो गया है। यह डेटा दर्शाता है कि भारतीय परिवार अब अपनी बचत को बेचने के बजाय गिरवी रखकर क्रेडिट सुविधा लेना ज्यादा पसंद कर रहे हैं।
क्रेडिट ग्रोथ की मुख्य वजह
इस ग्रोथ के पीछे सबसे बड़ा कारण सोने की कीमतों में लगातार तेजी है। जैसे-जैसे गहनों का कोलैटरल (Collateral) मूल्य बढ़ रहा है, उधार लेने वालों को अपनी संपत्ति बेचे बिना ही बड़ी रकम का लोन मिल रहा है। छोटे उद्यमियों के लिए यह वर्किंग कैपिटल पाने का सबसे तेज और आसान जरिया बन गया है।
नियामक माहौल और RBI की सख्ती
तेजी के साथ ही सेक्टर के सामने नई चुनौतियां भी हैं। अप्रैल 2026 से RBI ने गोल्ड लेंडिंग के लिए एक सख्त फ्रेमवर्क लागू किया है। इसमें लोन-टू-वैल्यू (LTV) रेशियो, वैल्यूएशन और ऑक्शन की प्रक्रिया को मानकीकृत (Standardize) किया गया है। अब Muthoot Finance और Manappuram Finance जैसी कंपनियों की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वे इन नियमों का पालन कितनी कुशलता से करती हैं।
मार्केट का रिस्क फैक्टर
हालांकि बैंकों का गोल्ड लोन बुक ₹5.52 लाख करोड़ के साथ अभी भी बड़ा है, लेकिन NBFCs अधिक आक्रामक ग्रोथ दिखा रहे हैं। अक्टूबर 2026 में RBI द्वारा रेपो रेट को 5.5% तक बढ़ाने के बाद कंपनियों के फंड की लागत बढ़ गई है, जिससे प्रॉफिट मार्जिन पर दबाव देखा जा सकता है।
सबसे बड़ी चिंता 'रिपीट बॉरोअर्स' को लेकर है, जो पुराने कर्ज चुकाने के लिए नया गोल्ड लोन ले रहे हैं। यदि सोने की कीमतों में बड़ी गिरावट आती है, तो यह चक्र कंपनियों के लिए डिफॉल्ट का जोखिम बढ़ा सकता है। निवेशकों को आने वाले समय में कंपनियों की एसेट क्वालिटी रिपोर्ट पर खास नजर रखनी होगी।
