भारत में गोल्ड लोन (Gold Loan) अब रिटेल क्रेडिट का बड़ा हिस्सा बन गया है, जो FY26 में ₹19.4 लाख करोड़ के आंकड़े को छू गया। हालांकि NBFCs अपना नेटवर्क तेजी से फैला रहे हैं, लेकिन RBI के नए नियमों का असर देखना होगा।
क्या हुआ?
भारत में गोल्ड लोन (Gold Loan) की डिमांड रॉकेट की तरह बढ़ रही है। FY26 में, कुल नए रिटेल लोन में इसका हिस्सा बढ़कर 41% हो गया, जो FY24 में सिर्फ 20% था। इस सेगमेंट का कुल बकाया पोर्टफोलियो पिछले साल के मुकाबले 49% बढ़कर ₹19.4 लाख करोड़ तक पहुंच गया। इसकी तुलना में, पूरा रिटेल लेंडिंग मार्केट सिर्फ 17% बढ़कर ₹170.2 लाख करोड़ का रहा। इससे साफ है कि लोग अब मुश्किल वक्त में ही नहीं, बल्कि लिक्विडिटी (liquidity) बढ़ाने के लिए भी सोने को एक अहम फाइनेंशियल एसेट (financial asset) के तौर पर इस्तेमाल कर रहे हैं।
लेंडर्स की बड़ी चालें
फाइनेंशियल कंपनियां इस डिमांड को भुनाने के लिए अपने फिजिकल नेटवर्क का तेजी से विस्तार कर रही हैं। L&T Finance ने FY27 में 400 नए गोल्ड लोन ब्रांच खोलने की योजना बनाई है। वहीं, Bajaj Finance अपने गोल्ड लोन पोर्टफोलियो को बढ़ाने की जुगत में है, जिसका लक्ष्य अपने कुल एसेट्स अंडर मैनेजमेंट (assets under management) में 5% से ज्यादा का योगदान देना है, जो अभी 3.5% है। Piramal Finance भी अगले साल 180 नई ब्रांच खोलने की तैयारी में है। एक बड़ा ट्रेंड यह भी है कि नॉन-बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनीज़ (NBFCs) पब्लिक सेक्टर बैंक से मार्केट शेयर छीन रही हैं, क्योंकि वे तेजी से प्रोसेसिंग और बेहतर रीच (reach) दे पा रही हैं।
रेगुलेटर की पैनी नजर
जहां ग्रोथ बंपर है, वहीं रेगुलेटर (regulator) भी इस पर पैनी नजर रखे हुए है। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने जून 2025 में इस बढ़ते सेक्टर के रिस्क (risk) को कंट्रोल करने के लिए कड़े नियम लागू किए हैं। नए नियमों के तहत, लोन-टू-वैल्यू (LTV) रेश्यो पर कैप (cap) लगाया गया है। यानी, सोने की कीमत का कितना प्रतिशत लोन के तौर पर दिया जा सकता है। ₹2.5 लाख तक के लोन के लिए यह लिमिट 85% और ₹5 लाख से ऊपर के लोन के लिए 75% तय की गई है। ये नियम सोने की कीमतों में उतार-चढ़ाव की स्थिति में भी लेंडर्स को सुरक्षित रखने के लिए बनाए गए हैं। RBI ने बुलेट रिपेमेंट (bullet repayment) वाले लोन पर भी सख्ती की है, जिसमें आखिर में पूरा प्रिंसिपल (principal) और इंटरेस्ट (interest) चुकाना होता है।
एसेट क्वालिटी और रिस्क
तेजी के बावजूद, गोल्ड लोन सेगमेंट की एसेट क्वालिटी (asset quality) स्थिर बनी हुई है। अप्रैल 2026 तक PAR (31-180) रेशियो, जो लोन की क्वालिटी को ट्रैक करता है, सुधरकर 1.3% पर आ गया, जो अप्रैल 2025 में 2.1% था। बढ़ती सोने की कीमतों से लेंडर्स को सुरक्षित कोलेटरल (collateral) मिल रहा है, जिससे इस सेगमेंट की मजबूती बनी हुई है। हालांकि, जैसे-जैसे लेंडर्स अपना पोर्टफोलियो बढ़ाएंगे, इस क्वालिटी को बनाए रखना एक बड़ी चुनौती होगी। FY26 में गोल्ड लोन का औसत साइज बढ़कर ₹1.96 लाख हो गया है, जो FY23 में ₹98,000 था। यह बढ़ी हुई सोने की वैल्यू और उधार लेने के व्यवहार में बदलाव दोनों को दर्शाता है।
निवेशकों के लिए क्या है खास?
इन्वेस्टर्स (investors) को यह देखना होगा कि कंपनियां इस हाई-ग्रोथ (high-growth) मौके को रेगुलेटरी कंप्लायंस (regulatory compliance) के साथ कैसे बैलेंस करती हैं। LTV कैप के बावजूद प्रॉफिट मार्जिन (profit margin) को बनाए रखना, कलेक्शन स्ट्रैटेजी (collection strategy) की इफेक्टिवनेस (effectiveness), और दक्षिण भारत के पारंपरिक बाजारों से बाहर विस्तार करने की उनकी सफलता, ये सब महत्वपूर्ण फैक्टर होंगे। सोने की कीमतों का ट्रेंड (trend) या RBI की तरफ से बॉरोअर लेवरेज (borrower leverage) को लेकर कोई भी नया अपडेट सेक्टर के लॉन्ग-टर्म परफॉर्मेंस (long-term performance) के लिए क्रिटिकल (critical) रहेगा।
