रिकॉर्ड तोड़ विदेशी कर्ज़: दिसंबर 2025 में भारतीय कंपनियों ने उठाए $4.43 बिलियन
दिसंबर 2025 भारतीय कॉर्पोरेट्स के लिए एक्सटर्नल कमर्शियल बोरिंग्स (ECBs) और फॉरेन करेंसी कन्वर्टिबल बॉन्ड्स (FCCBs) के मामले में एक रिकॉर्ड तोड़ महीना साबित हुआ। इस दौरान, कंपनियों ने कुल $4.43 बिलियन की विदेशी फंडिंग जुटाने के लिए फाइलिंग की, जो फाइनेंशियल ईयर 2026 में किसी भी एक महीने का अब तक का सबसे बड़ा आंकड़ा है। इस भारी-भरकम रकम में से $3.12 बिलियन ऑटोमैटिक रूट से जुटाए गए, जो फंड तक तुरंत पहुंच की सुविधा देता है, जबकि शेष $1.31 बिलियन के लिए खास रेगुलेटरी अप्रूवल की ज़रूरत पड़ी। यह दिखाता है कि भारतीय कंपनियां अपनी कैपिटल की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए कितनी आक्रामक रणनीति अपना रही हैं।
कौन-कौन हैं इस फेहरिस्त में?
कई बड़ी कंपनियों ने अपने विस्तार और रीफाइनेंसिंग प्लान्स के लिए विदेशी बाज़ारों का रुख किया। इनमें इंडियन रेलवे फाइनेंस कॉर्पोरेशन (IRFC) शामिल है, जिसने इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट के लिए $299.5 मिलियन मांगे हैं। एयर इंडिया भी कैपिटल गुड्स इम्पोर्ट के लिए $154.9 मिलियन जुटाने की कोशिश में है। इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन (IOC) मौजूदा ECBs को रीफाइनेंस करके लागत कम करने के लिए $300 मिलियन की योजना बना रहा है।
नॉन-बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनियां (NBFCs) और वित्तीय संस्थान भी इस दौड़ में पीछे नहीं हैं। आदित्य बिड़ला कैपिटल NBFC अगले तीन साल में ऑन-लेंडिंग के लिए $300 मिलियन उधार लेने का इरादा रखती है, जबकि पिरामल फाइनेंस लिमिटेड चार साल की अवधि के लिए समान उद्देश्य से $125 मिलियन जुटाना चाहती है। HDFC बैंक की सब्सिडियरी HDB फाइनेंशियल सर्विसेज मल्टीलेटरल संस्थानों से ऑन-लेंडिंग के लिए $150 मिलियन की तलाश में है। इसके अलावा, पावर फाइनेंस कॉर्पोरेशन (PFC) ऑन-लेंडिंग के लिए $499.8 मिलियन की फैसिलिटी प्लान कर रही है, और सरकारी EXIM बैंक ने भी ऑन-लेंडिंग गतिविधियों के लिए $350 मिलियन की फाइलिंग की है। इंटरग्लोब एविएशन भी कैपिटल गुड्स इम्पोर्ट के लिए $4.63 बिलियन जैसी बड़ी रकम जुटाने की योजना बना रही है।
रुपये का गिरता ग्राफ और बढ़ता कर्ज़ का बोझ
हालांकि, विदेशी करेंसी में इतना बड़ा कर्ज़ उठाना कंपनियों के लिए करेंसी में उतार-चढ़ाव का बड़ा रिस्क भी पैदा करता है। पिछले 12 महीनों में, भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले करीब 4.23% कमजोर हुआ है, और 10 फरवरी, 2026 को यह 90.4680 के स्तर पर कारोबार कर रहा था। अनुमान है कि 2026 के अंत तक रुपया डॉलर के मुकाबले 87 से 90 के बीच रह सकता है। इसका मतलब है कि विदेशी करेंसी में कर्ज़ लेने वाली कंपनियों के लिए इसे चुकाने का बोझ बढ़ सकता है। ECBs में यह एक्सचेंज रेट रिस्क स्वाभाविक है, क्योंकि प्रिंसिपल और इंटरेस्ट दोनों का भुगतान विदेशी करेंसी में करना होता है, और अगर रुपया काफी गिरता है तो कम ब्याज दरों का फायदा भी खत्म हो सकता है।
NBFCs और इंफ्रा बने मुख्य वजह
NBFCs और इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़ी कंपनियां इस कैपिटल-रेज़िंग ट्रेंड का नेतृत्व कर रही हैं। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) द्वारा NBFCs को बैंक क्रेडिट पर रिस्क वेटेज बढ़ाने जैसे हालिया रेगुलेटरी बदलावों ने डोमेस्टिक फंडिंग को महंगा कर दिया है, जिससे ECBs ऑन-लेंडिंग और वर्किंग कैपिटल की ज़रूरतों के लिए ज़्यादा आकर्षक हो गए हैं। IRFC और PFC जैसी इंफ्रा कंपनियों के लिए, बड़े प्रोजेक्ट्स को फंड करने में ECBs महत्वपूर्ण हैं, खासकर रेलवे डेवलपमेंट और पावर सेक्टर के विस्तार के लिए सरकारी बजट एलोकेशन को देखते हुए।
कर्ज़ का बढ़ता जाल: लेवरेज और एक्सपोजर का बड़ा रिस्क
यह भारी-भरकम विदेशी उधार कई भारतीय कॉर्पोरेशन्स के लिए फाइनेंशियल लेवरेज को बढ़ाता है। उदाहरण के तौर पर, IRFC का डेट-टू-इक्विटी रेश्यो पिछले पांच सालों में औसतन 8.81 रहा है, और मार्च 2025 तक इसका नेट डेट-टू-इक्विटी 774.4% था। इसी तरह, आदित्य बिड़ला कैपिटल का डेट-टू-इक्विटी रेश्यो 4.37 है। ऐसे उच्च लेवरेज वाली कंपनियां आर्थिक मंदी और ब्याज दरों में बढ़ोतरी के प्रति ज़्यादा संवेदनशील हो जाती हैं। इन इकाइयों का मौजूदा P/E रेश्यो, जैसे आदित्य बिड़ला कैपिटल का लगभग 25.5-28.95 और IRFC का लगभग 5.41, अलग-अलग मार्केट वैल्यूएशन का संकेत देता है, लेकिन उनके अंदरूनी कर्ज़ प्रोफाइल की जांच ज़रूरी है।
मैक्रोइकॉनॉमिक्स का सपोर्ट
यह विदेशी उधार का दौर ऐसे समय में हो रहा है जब डोमेस्टिक मॉनेटरी पॉलिसी स्थिर है। RBI ने फरवरी 2026 में अपनी की-रेपो रेट 5.25% पर बरकरार रखी, दिसंबर 2025 में 25 बेसिस पॉइंट की कटौती के बाद। इसका कारण महंगाई का कम दबाव और मज़बूत आर्थिक वृद्धि है। सितंबर तिमाही 2025 में भारत की GDP 8.2% बढ़ी थी, और FY26 के लिए GDP फोरकास्ट को 7.4% तक बढ़ा दिया गया है। ऐसे माहौल में, जब डोमेस्टिक इंटरेस्ट रेट कम हैं, कंपनियां विदेश से सस्ती फंडिंग के लिए प्रेरित हो सकती हैं।
भविष्य की राह और एक्सपर्ट्स की राय
एक्सपर्ट्स 2026 के लिए भारतीय रुपये को अस्थिर लेकिन कुल मिलाकर स्थिर से थोड़ा मज़बूत रहने का अनुमान लगा रहे हैं, डॉलर के मुकाबले 86 से 90 के बीच। यह स्थिरता उधारकर्ताओं के लिए कुछ करेंसी रिस्क को कम कर सकती है। हालांकि, अंतर्राष्ट्रीय व्यापार समझौतों और संभावित अमेरिकी टैरिफ को लेकर अनिश्चितताएं बनी हुई हैं। RBI का मुख्य ध्यान पॉलिसी ट्रांसमिशन सुनिश्चित करने पर है, लेकिन भारतीय कॉर्पोरेशन्स द्वारा ECBs पर लगातार निर्भरता विदेशी कैपिटल की मांग को दर्शाती है। वैश्विक ब्याज दरों में बढ़ोतरी और लगातार करेंसी की अस्थिरता की संभावना को देखते हुए, बाहरी कर्ज़ का सावधानीपूर्वक प्रबंधन कंपनियों के लिए महत्वपूर्ण बना रहेगा।
