क्यों हो रही है इतनी फंड जुटाने की होड़?
यह डेट इश्यूएंस (Debt Issuance) में रिकॉर्ड उछाल सीधे तौर पर भारतीय अर्थव्यवस्था में जारी आक्रामक फंडिंग स्ट्रैटेजी (aggressive funding strategy) का नतीजा है, जिसका मकसद ग्रोथ के मौके भुनाना और महत्वाकांक्षी इंफ्रास्ट्रक्चर (infrastructure) लक्ष्यों को पूरा करना है। इश्यूएंस का यह भारी वॉल्यूम (volume) मार्केट की लिक्विडिटी (liquidity) का बड़ा हिस्सा सोख रहा है, जो भविष्य में बॉरोइंग कॉस्ट (borrowing cost) और इंटरेस्ट रेट (interest rate) के माहौल को प्रभावित कर सकता है। यह मजबूत आर्थिक गतिविधि का संकेत देता है, लेकिन साथ ही डेट सस्टेनेबिलिटी (debt sustainability) और मैक्रोइकॉनॉमिक स्टेबिलिटी (macroeconomic stability) पर भी बारीकी से नज़र रखने की ज़रूरत है।
राज्यों का खज़ाना भरने का प्लान
राज्य सरकारें डेट मार्केट का भरपूर इस्तेमाल कर रही हैं। मंगलवार को ही चौदह राज्यों ने मिलाकर बॉन्ड ऑक्शन के ज़रिए करीब ₹380 अरब जुटाए। यह लगातार बोर्रोइंग (borrowing) का पैटर्न बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स (projects) और राज्य-स्तरीय खर्चों को फंड करने के प्रयासों को दर्शाता है। ये इश्यूएंस ऐसे समय में हो रहे हैं जब बेंचमार्क 10-साल के स्टेट डेवलपमेंट लोन यील्ड (yield) लगभग 7.2% के आसपास हैं, जो सॉवरेन-बैक्ड बोर्रोइंग की कॉस्ट और गवर्नमेंट डेट के लिए मार्केट की ऐपेटाइट (appetite) को दर्शाते हैं। रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) इस महत्वपूर्ण फिस्कल मैनेजमेंट (fiscal management) का लगातार पर्यवेक्षण कर रहा है।
कॉर्पोरेट सेक्टर की पूंजी जुटाने की रणनीति
कॉर्पोरेट सेक्टर में पूंजी की ज़बरदस्त मांग देखने को मिल रही है। कई एंटिटीज़ (entities) बड़े बॉन्ड और नॉन-कन्वर्टिबल डिबेंचर (NCD) प्लेसमेंट के लिए तैयार हैं। Poonawalla Fincorp अपने बैलेंस शीट (balance sheet) को मजबूत करने के लिए 10-साल के बॉन्ड्स के ज़रिए करीब ₹5 अरब जुटाने का लक्ष्य बना रहा है। Veritas Finance भी चार-साल के बॉन्ड्स में ₹2 अरब के लिए मार्केट में है। पब्लिक सेक्टर की बात करें तो NHPC करीब ₹20 अरब जुटाने की योजना बना रहा है, जबकि REC Ltd. ने ₹1.5 ट्रिलियन के टारगेट वाले मल्टी-ट्रेंच NCD इश्यूएंस का महत्वाकांक्षी प्लान बनाया है। ये बड़े पैमाने के कॉर्पोरेट फाइनेंसिंग ऐसे मार्केट में हो रहे हैं जहां A-रेटेड कॉर्पोरेट बॉन्ड्स पर लगभग 7.8% यील्ड मिल रही है, जो क्रेडिट रिस्क (credit risk) के कारण सॉवरेन डेट से थोड़ी ज़्यादा है। REC Ltd. का मार्केट कैप करीब ₹45,000 करोड़ है जिसका P/E 18x है, वहीं NHPC का मार्केट कैप लगभग ₹50,000 करोड़ और P/E 22x है।
इंडस्ट्री और रियल एस्टेट सेक्टर की फंड जुटाने की दौड़
इंडस्ट्रियल और रियल एस्टेट सेक्टर के बड़े खिलाड़ी भी भारी पूंजी के लिए डेट मार्केट का रुख कर रहे हैं। JSW Steel अपनी ऑपरेशंस (operations) की पूंजी-गहन प्रकृति को देखते हुए NCDs के ज़रिए खासी ₹50 अरब जुटाने की तैयारी में है; कंपनी का मार्केट कैप लगभग ₹2.5 लाख करोड़ और P/E 12x है। Prestige Estates अपने प्रोजेक्ट पाइपलाइन (pipeline) को सपोर्ट करने के लिए ₹20 अरब का NCD इश्यूएंस करने की योजना बना रहा है, जिसका मार्केट कैप लगभग ₹25,000 करोड़ और P/E 30x है। Torrent Pharma भी अपने लगभग ₹40,000 करोड़ के मार्केट कैप और 25x P/E के साथ NCDs के ज़रिए ₹30 अरब जुटाने की जुगत में है। ये इश्यूएंस विस्तार के लिए डेट फाइनेंसिंग पर सेक्टर की निर्भरता को उजागर करते हैं।
बैंकिंग सेक्टर की डेट स्ट्रेटेजी और आउटलुक (Outlook)
फाइनेंशियल इंस्टीट्यूशंस (Financial Institutions) डेट मार्केट की एक्टिविटी में बड़े योगदानकर्ता हैं। Axis Bank अपने कैपिटल बेस (capital base) को मजबूत करने और लोन ग्रोथ (loan growth) को फंड करने के लिए डेट मार्केट से एक महत्वपूर्ण ₹350 अरब जुटाने का इरादा रखता है। Bank of Maharashtra फाइनेंशियल ईयर 2025-26 के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर बॉन्ड्स के ज़रिए ₹100 अरब का इश्यूएंस करने की योजना बना रहा है। यह व्यापक बोर्रोइंग स्प्री (spree) ऐसे समय में हो रही है जब RBI अपनी पॉलिसी रेट्स (policy rates) को स्थिर रखे हुए है, जो महंगाई (inflation) को मैनेज करने पर केंद्रित मॉनेटरी पॉलिसी (monetary policy) के प्रति एक सतर्क दृष्टिकोण का संकेत देता है, जबकि ग्रोथ को भी सपोर्ट कर रहा है। भारतीय रुपये (Indian Rupee) का आउटलुक स्थिर से थोड़ा डेप्रिशिएट (depreciate) होने की ओर है। एनालिस्ट्स (Analysts) का कहना है कि जहाँ यह बोर्रोइंग भारत के इंफ्रास्ट्रक्चर और ग्रोथ लक्ष्यों के लिए महत्वपूर्ण है, वहीं इतना ज़्यादा वॉल्यूम खासी लिक्विडिटी सोख सकता है, जिससे क्रेडिट स्प्रेड (credit spreads) बढ़ सकते हैं और वोलेटिलिटी (volatility) बढ़ सकती है, खासकर अगर मार्केट कंडीशंस (market conditions) बदलती हैं, ग्लोबल इंटरेस्ट रेट्स ऊंचे बने रहते हैं या डोमेस्टिक इन्फ्लेशन (domestic inflation) बना रहता है।
