कर्जदारों की बढ़ती परेशानी और सख्त वसूली के तरीके
एक सर्वे के अनुसार, 39% लोगों को लोन की वसूली के दौरान अपमानजनक कॉल आते हैं। वहीं, 28% कर्जदार एक से ज़्यादा लेंडर्स (Lenders) से परेशान हैं। 11% लोगों ने रिकवरी एजेंट्स (Recovery Agents) की ओर से फिजिकल विजिट की बात कही, और 8% को कानूनी कार्रवाई या पुलिस में जाने की धमकी दी गई। यह दिखाता है कि कर्ज वसूली के तरीके सख्त होते जा रहे हैं।
NPA कम, पर कर्जदार परेशान: RBI की चिंता
यह चौंकाने वाली बात है कि जहां एक ओर भारतीय वित्तीय व्यवस्था सेहतमंद दिख रही है और नॉन-परफॉर्मिंग एसेट्स (NPAs) अपने निचले स्तर पर हैं, वहीं दूसरी ओर व्यक्तिगत कर्जदारों पर भारी दबाव है। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने भी इस बात पर गौर किया है कि बड़े आंकड़े भले ही अच्छे दिखें, लेकिन यह जमीनी हकीकत को छिपा सकते हैं।
ज़रूरतें पूरी करने के लिए ले रहे लोन, संपत्ति निर्माण नहीं
कर्ज लेने के पीछे की वजहों में बड़ा बदलाव आया है। सर्वे में 26% लोगों ने मेडिकल इमरजेंसी के लिए लोन लिया, जबकि 22% ने पर्सनल या फैमिली खर्चों (जैसे पढ़ाई, शादी) के लिए। सिर्फ 18% ने बिजनेस या आय के अंतर को भरने के लिए कर्ज लिया। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि केवल 9% लोगों ने ही घर या गाड़ी जैसी संपत्ति बनाने के लिए कर्ज लिया। यह दिखाता है कि लोग अब ज़रूरतें पूरी करने के लिए ज़्यादा लोन ले रहे हैं, न कि भविष्य के लिए संपत्ति बनाने के लिए।
हाउसहोल्ड डेट बढ़ा, RBI की रिटेल लेंडिंग पर पैनी नज़र
यह ट्रेंड अर्थव्यवस्था के बड़े आंकड़ों से भी मेल खाता है। RBI के ताज़ा आंकड़ों के मुताबिक, भारत में हाउसहोल्ड डेट (Household Debt) जीडीपी (GDP) के 40% को पार कर गया है। खासकर पर्सनल लोन और क्रेडिट कार्ड जैसे असुरक्षित (Unsecured) रिटेल लोन में तेज़ी देखी जा रही है, जिस पर RBI की कड़ी नज़र है। केंद्रीय बैंक पहले ही इस विस्तार से जुड़े जोखिमों के प्रति आगाह कर चुका है, जिसके चलते इन श्रेणियों में लेंडर्स के लिए नियम कड़े किए गए हैं।
छिपे जोखिम और आगे का रास्ता
Expert Panel के डायरेक्टर अनुराग मेहरा के अनुसार, 'क्रेडिट तक आसान पहुँच ज़रूरी है, लेकिन इसके साथ ज़िम्मेदाराना उधार और उचित वसूली भी ज़रूरी है।' असुरक्षित लोन, जो अक्सर किसी संपत्ति से सुरक्षित नहीं होते, आर्थिक मंदी या झटके आने पर डिफॉल्ट (Default) होने का ज़्यादा जोखिम रखते हैं। मौजूदा कम NPA आंकड़े इन छिपे हुए तनाव को पूरी तरह नहीं दर्शा रहे। कुल मिलाकर, भारत का क्रेडिट मार्केट (Credit Market) ऐसे मोड़ पर है जहाँ कर्जदार ज़्यादा असुरक्षित हैं और लोन लेने का मकसद उपभोग (Consumption) की ओर बढ़ रहा है। भविष्य में कोई भी आर्थिक झटका या ब्याज दरों में बदलाव कर्ज चुकाने की चुनौतियों को बढ़ा सकता है।