भारत में औपचारिक क्रेडिट (Formal Credit) तक पहुंच **2017** के मुकाबले दोगुनी से ज्यादा हो गई है, जो मार्च **2026** तक **74%** के स्तर पर पहुंच गई। रिटेल लोन पोर्टफोलियो में **19.2%** की उछाल के साथ यह **₹179 लाख करोड़** हो गया है, लेकिन नए उधारकर्ताओं के बढ़ते दबाव ने एसेट क्वालिटी पर चिंताएं बढ़ा दी हैं।
भारत के वित्तीय सिस्टम में पिछले नौ सालों में बड़ा बदलाव आया है। मार्च 2017 में जहां केवल 35% आबादी की फॉर्मल बैंकिंग तक पहुंच थी, वहीं मार्च 2026 तक यह आंकड़ा 74% पहुंच गया है। जून 2026 तिमाही में देश का रिटेल क्रेडिट पोर्टफोलियो 19.2% की सालाना दर से बढ़कर ₹179 लाख करोड़ के ऐतिहासिक स्तर पर पहुंच गया है।\n\n### ग्रोथ के मुख्य ड्राइवर\nइस तेजी के पीछे पहली बार कर्ज लेने वाले (New-to-credit) ग्राहकों की बड़ी संख्या है। फाइनेंशियल ईयर 2027 की पहली तिमाही में कुल नए लोन का 46% हिस्सा अकेले कंज्यूमर ड्यूरेबल लोन से आया है। डिजिटल लेंडिंग प्लेटफॉर्म्स और पॉइंट-ऑफ-सेल फाइनेंसिंग ने बिना क्रेडिट हिस्ट्री वाले लोगों के लिए लोन लेना बेहद आसान बना दिया है। इसके अलावा गोल्ड लोन और पर्सनल लोन भी नए ग्राहकों के लिए सबसे पसंदीदा विकल्प बनकर उभरे हैं।\n\n### टियर-2 और टियर-3 शहरों में विस्तार\nबैंक और NBFCs अब केवल मेट्रो शहरों तक सीमित नहीं हैं। टियर-2 और टियर-3 शहरों में टू-व्हीलर और कंज्यूमर लोन की मांग में आई तेजी ने कंपनियों का एड्रेसेबल मार्केट काफी बढ़ा दिया है।\n\n### बढ़ता जोखिम और चुनौतियां\nतेजी के साथ ही चुनौतियां भी सामने आई हैं। अनसिक्योर्ड लोन और माइक्रोफाइनेंस पोर्टफोलियो में स्ट्रेस बढ़ता दिख रहा है। बैंकों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वे ग्रोथ को बनाए रखते हुए नए ग्राहकों की रिपेमेंट कैपेसिटी की जांच कैसे करते हैं। इसके अलावा, क्रेडिट और डिपॉजिट ग्रोथ के बीच के अंतर ने भी बैंकों की कॉस्ट ऑफ फंड्स पर दबाव डाला है, जिससे नेट इंटरेस्ट मार्जिन (NIM) पर असर पड़ सकता है। भविष्य में एसेट क्वालिटी और रिस्क मैनेजमेंट ही तय करेगा कि यह क्रेडिट विस्तार टिकाऊ साबित होगा या फिर डिफॉल्ट्स में बढ़ोतरी से बैंकों की अर्निंग्स में अस्थिरता आएगी।
