चालू फाइनेंशियल ईयर के पहले चार महीनों में कॉर्पोरेट फंडिंग में **138%** का जबरदस्त उछाल आया है, जो कुल **₹10.6 लाख करोड़** तक पहुंच गई है। इस फंडिंग में **63%** हिस्सा अकेले बैंकों का है, जो इंडस्ट्री में तेजी के संकेत हैं।
बैंकों पर बढ़ रहा है निर्भरता का दबाव
भारतीय कंपनियों ने इस साल पूंजी जुटाने के लिए मार्केट की जगह बैंक लोन को प्राथमिकता दी है। आंकड़ों के मुताबिक, कुल फंडिंग का 63% हिस्सा बैंकों से आ रहा है। यह बदलाव दर्शाता है कि कंपनियां अब पारंपरिक लोन के जरिए अपना कामकाज फैलाना पसंद कर रही हैं।
एनर्जी और इंजीनियरिंग सेक्टर में बड़ी स्पेंडिंग
इस कर्ज का बड़ा हिस्सा एनर्जी, कैपिटल गुड्स और इंजीनियरिंग सेक्टर में जा रहा है। इंडस्ट्री में क्रेडिट डिमांड 20% की सालाना दर से बढ़ रही है, जो यह साबित करता है कि कंपनियां भविष्य की मांग को लेकर आश्वस्त हैं और बड़े पैमाने पर अपनी क्षमता विस्तार (Capacity Expansion) कर रही हैं।
बैंकिंग लिक्विडिटी की स्थिति
बैंकों के लिए लिक्विडिटी का संकट अगस्त 2026 तक कुछ हद तक कम हुआ है और डिपॉजिट का अंतर घटकर करीब ₹2 लाख करोड़ पर आ गया है। इसका श्रेय FCNR(B) डिपॉजिट में आए मजबूत इनफ्लो को जाता है। फिलहाल क्रेडिट-डिपॉजिट रेशियो 80.6% पर है, जो संकेत देता है कि बैंक अपने उपलब्ध कैश का बड़ा हिस्सा लोन के तौर पर बांट रहे हैं।
भविष्य की चुनौती: ₹1.5 लाख करोड़ की जरूरत
आने वाला समय बैंकों के लिए आसान नहीं होगा। मार्च 2028 तक बैंकों को करीब ₹1.5 लाख करोड़ की नई पूंजी जुटानी पड़ सकती है। इसका मुख्य कारण Basel III के तहत AT1 बॉन्ड्स को रिफाइनेंस करना है। विशेष रूप से पब्लिक सेक्टर बैंक इसके दबाव में रहेंगे। निवेशकों के लिए यह चिंता का विषय हो सकता है क्योंकि भविष्य में इक्विटी डाइल्यूशन या नए डेट जारी होने की संभावना है, जिसका असर बैंक शेयरों पर पड़ सकता है।
