UPI में मर्चेंट फीस की तैयारी? भारत सरकार ने उठाया बड़ा कदम, जानें क्या होगा असर

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AuthorMehul Desai|Published at:
UPI में मर्चेंट फीस की तैयारी? भारत सरकार ने उठाया बड़ा कदम, जानें क्या होगा असर

भारत सरकार यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) के भविष्य को सुरक्षित करने के लिए एक बड़ा कदम उठा सकती है। नए प्रस्तावित कानून के तहत, कुछ चुनिंदा UPI ट्रांजैक्शन्स पर मर्चेंट्स से फीस वसूली जा सकती है, ताकि नेटवर्क के इंफ्रास्ट्रक्चर की लागत को पूरा किया जा सके। यह फैसला व्यक्तिगत यूजर्स के लिए पेमेंट्स को फ्री रखने के उद्देश्य से लिया जा रहा है।

UPI का बदल सकता है बिजनेस मॉडल

भारत सरकार यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) के बिजनेस मॉडल में बड़ा बदलाव लाने की तैयारी में है। नए प्रस्तावित कानून के तहत, कुछ खास तरह के UPI ट्रांजैक्शन्स पर मर्चेंट्स से फीस चार्ज करने की इजाजत दी जा सकती है। यह कदम जनवरी 2020 से चली आ रही 'जीरो-मर्चेंट-डिस्काउंट-रेट' (MDR) पॉलिसी से एक बड़ा बदलाव होगा। अभी तक, मर्चेंट्स को UPI पेमेंट्स स्वीकार करने के लिए कोई फीस नहीं देनी पड़ती, जिसकी वजह से इस नेटवर्क को तेजी से अपनाने में मदद मिली है।

इंफ्रास्ट्रक्चर की बढ़ती लागत

नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (NPCI) के आंकड़ों के मुताबिक, UPI नेटवर्क जबरदस्त स्केल पर काम कर रहा है। जुलाई 2026 में ही, 23.66 अरब से ज्यादा ट्रांजैक्शन्स हुए, जिनकी कुल वैल्यू ₹29.88 ट्रिलियन थी। जैसे-जैसे ट्रांजैक्शन की संख्या बढ़ रही है, बैंक और फिनटेक कंपनियों ने चिंता जताई है कि इस फ्री-पेमेंट मॉडल को बनाए रखना मुश्किल होता जा रहा है। इतने बड़े वॉल्यूम के लिए जरूरी इंफ्रास्ट्रक्चर, आईटी, डिजिटल इनोवेशन और साइबर सिक्योरिटी में भारी निवेश की आवश्यकता होती है।

मर्चेंट फीस से कैसे मिलेगी मदद?

इंडस्ट्री के लीडर्स और फाइनेंशियल इंस्टीट्यूशन्स का सुझाव है कि मर्चेंट्स से फीस लेने से एक स्थायी फंडिंग मॉडल तैयार हो सकता है। इसका मकसद पेमेंट फर्म्स और बैंक्स को नेटवर्क को बड़ा करने में आने वाली लागतों को वसूलने में मदद करना है, वहीं यह सुनिश्चित करना है कि व्यक्तिगत यूजर्स के लिए पीयर-टू-पीयर (P2P) और कंज्यूमर-टू-मर्चेंट (C2M) पेमेंट्स फ्री रहें।

रेवेन्यू पर क्या होगा असर?

हालांकि, प्रस्तावित कानून में अभी फीस का सटीक ढांचा तय नहीं किया गया है। फाइनेंशियल एनालिस्ट्स इसके संभावित रेवेन्यू पर पड़ने वाले असर का आकलन कर रहे हैं। जेफरीज (Jefferies) के अनुमानों के मुताबिक, अगर 15 से 30 बेसिस पॉइंट की फीस हायर-वैल्यू UPI ट्रांजैक्शन्स पर लागू की जाती है, तो फाइनेंशियल ईयर 2028 तक ₹50 अरब से ₹100 अरब का सालाना रेवेन्यू जेनरेट हो सकता है।

बड़ी कंपनियों पर फोकस?

बर्नस्टीन (Bernstein) जैसी फर्म्स के मार्केट एक्सपर्ट्स का मानना है कि नई फीस स्ट्रक्चर को शायद सभी पर लागू करने के बजाय बड़े बिजनेसेज पर टारगेट किया जा सकता है। इससे UPI के कंज्यूमर-फ्रेंडली नेचर को बनाए रखने में मदद मिलेगी, साथ ही फाइनेंशियल इकोसिस्टम के लिए एक नया रेवेन्यू सोर्स भी तैयार होगा। आंकड़े बताते हैं कि ₹2,000 से ज्यादा के ट्रांजैक्शन्स, जो कुल ट्रांजैक्शन वॉल्यूम का सिर्फ 4% हैं, कुल ट्रांजैक्शन वैल्यू का लगभग 70% बनाते हैं।

इकोसिस्टम पर प्रभाव

इस रेगुलेटरी बदलाव का डिजिटल पेमेंट्स स्पेस के बड़े खिलाड़ियों, जैसे PhonePe और Google Pay, पर बड़ा असर पड़ेगा, जो UPI ट्रांजैक्शन्स का एक बड़ा हिस्सा संभालते हैं। इन कंपनियों को कितना फायदा होगा, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि सरकार कलेक्ट की गई फीस को बैंक्स, पेमेंट सर्विस प्रोवाइडर्स और इंफ्रास्ट्रक्चर एन्टीटीज के बीच कैसे बांटती है। जैसे-जैसे भारत UPI मॉडल को सिंगापुर, UAE और फ्रांस जैसे देशों में एक्सपोर्ट करने की कोशिश कर रहा है, डोमेस्टिक फीस स्ट्रक्चर की सस्टेनेबिलिटी ग्लोबल स्केलेबिलिटी के लिए एक महत्वपूर्ण संकेतक बन जाती है। इन्वेस्टर्स यह समझने के लिए रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) और सरकार की भविष्य की सूचनाओं पर नजर रखेंगे कि किन स्पेसिफिक ट्रांजैक्शन कैटेगरीज पर चार्ज लगेंगे और इसे कब लागू किया जाएगा।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.