बैंक लोन की बढ़ी अहमियत
फाइनेंशियल ईयर 2026 में भारतीय कॉरपोरेट सेक्टर ने अपने फाइनेंस जुटाने की रणनीति में बड़ा बदलाव किया है। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) के अप्रैल बुलेटिन के मुताबिक, कुल ₹44.7 लाख करोड़ का फंड जुटाया गया, जिसमें बैंक लोन का दबदबा रहा। नॉन-फूड बैंक क्रेडिट में भारी उछाल आया और यह ₹29.2 लाख करोड़ तक पहुंच गया, जो कुल राशि का 65.4% है। यह पिछले तीन सालों में बैंक लोन की सबसे बड़ी हिस्सेदारी है।
कुल बकाया बैंक क्रेडिट मार्च 2026 तक ₹219 लाख करोड़ पर पहुंच गया, जो पिछले साल से 16% ज्यादा है। बैंक लोन की यह मजबूत ग्रोथ, डिपॉजिट ग्रोथ से तेज रही, जिससे बैंकों पर फंड का दबाव बना रहा।
मार्केट से फंड जुटाने में आई मुश्किलें
बैंक लोन के मुकाबले, दूसरे मार्केट से फंड जुटाना मुश्किल रहा। इक्विटी यानी शेयर बाजार से फंड जुटाने का हिस्सा FY25 के 10.8% से घटकर FY26 में 7.7% रह गया। FY26 में ₹1.8 लाख करोड़ के रिकॉर्ड IPOs के बावजूद, स्मॉल एंड मीडियम एंटरप्राइज (SME) सेक्टर में ग्रोथ धीमी रही। इससे भी खास बात यह है कि पिछले छह सालों से शेयर खरीदने वाले खुदरा निवेशक FY26 में नेट सेलर बन गए और उन्होंने ₹5,803 करोड़ के शेयर बेच दिए।
इसी दौरान, कॉर्पोरेट बॉन्ड मार्केट में भी नरमी देखी गई। लिस्टेड कॉर्पोरेट बॉन्ड से जुटाए गए फंड पिछले साल के मुकाबले 9% घटकर ₹8.99 ट्रिलियन रह गए। इसकी मुख्य वजह बॉन्ड यील्ड में तेज बढ़ोतरी रही। 10-साल के सरकारी बॉन्ड की यील्ड मार्च 2026 तक 55 बेसिस पॉइंट बढ़कर 7.03% हो गई। इससे कॉर्पोरेट बॉन्ड, बैंक लोन की तुलना में कम आकर्षक हो गए। कमर्शियल पेपर (शॉर्ट-टर्म डेट) इश्यूएंस में 57.8% की बड़ी गिरावट ने भी शॉर्ट-टर्म फंड में कम रुचि और लॉन्ग-टर्म उधारी या बैंक लोन को तरजीह देने का संकेत दिया।
विदेशी निवेश और विदेशी कर्ज से मिली राहत
भारतीय शेयर बाजारों के विपरीत, विदेशी पूंजी की भूमिका बढ़ी है। कुल फंड में इसकी हिस्सेदारी FY24 के 6.8% से बढ़कर FY26 में 11% यानी ₹4.9 लाख करोड़ हो गई। अप्रैल से दिसंबर 2025 के दौरान भारत में फॉरेन डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट (FDI) इक्विटी में 22% की मजबूत साल-दर-साल वृद्धि देखी गई, जो ₹4,16,709 करोड़ पर पहुंच गई। नेट एफडीआई में भी बड़ा सुधार हुआ और फरवरी 2026 में छह महीने के आउटफ्लो के बाद यह पॉजिटिव हो गया। एक्सटर्नल कमर्शियल बॉरोइंग्स (ECBs) यानी कंपनियों के लिए अंतरराष्ट्रीय लोन 66.2% उछल गए, जो विदेशी कर्ज में बढ़ी हुई रुचि को दर्शाता है।
बैंक लोन की ओर क्यों बढ़ा झुकाव?
बैंक फाइनेंस की ओर इस स्पष्ट बदलाव के पीछे कई कारण हैं। ग्लोबल महंगाई की चिंताओं और भारत की कैश फ्लो स्थिति के कारण बढ़ती बॉन्ड यील्ड ने कॉर्पोरेट बॉन्ड को बैंक लोन की तुलना में कम लागत प्रभावी बना दिया। RBI ने अप्रैल 2026 में अपनी प्रमुख ब्याज दर (रेपो रेट) 5.25% पर स्थिर रखी, जिसका लक्ष्य ग्लोबल भू-राजनीतिक जोखिमों के बावजूद महंगाई को काबू में रखना और ग्रोथ को सहारा देना है। एनालिस्ट्स को उम्मीद है कि भारतीय बैंकिंग सेक्टर मजबूत बना रहेगा, जिसमें जनवरी से जून 2026 के दौरान 11-13% की क्रेडिट ग्रोथ का अनुमान है। बेहतर बैंक बैलेंस शीट और कंज्यूमर व छोटे व्यवसायों की मांग इसका समर्थन कर रही है।
हालांकि, शेयर बाजार में खुदरा निवेशकों की कम संख्या और शॉर्ट-टर्म डेट में कम गतिविधि कुछ मार्केट पार्टिसिपेंट्स की सावधानी दिखाती है। यह सावधानी वैश्विक आर्थिक चुनौतियों, जैसे पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष, से उत्पन्न हो सकती है। कंपनियों के निवेश की योजना FY26 में बढ़कर ₹4.35 लाख करोड़ हो गई, लेकिन कुल फंडिंग के विकल्प शेयर बाजारों से हटकर बैंक क्रेडिट की ओर एक रणनीतिक कदम दिखाते हैं, जो मिलने में आसान है पर अधिक प्रतिबंधात्मक हो सकता है।
नई फंडिंग मिक्स में संभावित जोखिम
बैंकों से मिलने वाले कर्ज में मजबूत ग्रोथ के बावजूद, कुछ अंतर्निहित चिंताएं ध्यान देने योग्य हैं। शेयरों में व्यक्तिगत निवेशकों की भारी गिरावट भविष्य के मार्केट प्रदर्शन को लेकर चिंताओं या गोल्ड और सिल्वर जैसे सुरक्षित निवेशों की ओर झुकाव का संकेत देती है, जिन्होंने FY25 और FY26 में अच्छा प्रदर्शन किया। बैंक क्रेडिट पर अत्यधिक निर्भरता, भले ही अच्छे दरों के कारण अल्पावधि में आकर्षक हो, नए जोखिम पैदा कर सकती है। बैंकों के लिए क्रेडिट का डिपॉजिट से तेज बढ़ना एक समस्या बनी हुई है, जो अगर जारी रहा तो वित्तीय प्रणाली में कैश फ्लो को टाइट कर सकता है। इसके अलावा, कमर्शियल पेपर में गिरावट और कम आकर्षक कॉर्पोरेट बॉन्ड का मतलब है कि कंपनियां अधिक लचीले मार्केट फंडिंग की जगह बैंक लोन चुन रही हैं। बैंक लोन में अक्सर सख्त नियम होते हैं और लॉन्ग-टर्म लोन में बदलाव के विकल्प कम होते हैं। पश्चिम एशिया जैसे संघर्षों से उत्पन्न भू-राजनीतिक तनाव और संभावित सप्लाई चेन की दिक्कतें भी आर्थिक विकास को धीमा कर सकती हैं और महंगाई बढ़ा सकती हैं। इसका असर कंपनी के मुनाफे और कर्ज चुकाने की उनकी क्षमता पर पड़ सकता है।
कॉरपोरेट फंडिंग का भविष्य क्या?
आगे चलकर, भारत की अर्थव्यवस्था के FY27 में 6.9% बढ़ने का अनुमान है, हालांकि वैश्विक अनिश्चितताएं और अल नीनो के कारण खाद्य कीमतों पर संभावित प्रभाव इस पूर्वानुमान के लिए जोखिम पैदा करते हैं। 2026 में कंपनी के मुनाफे में डबल-डिजिट यानी 15% के आसपास की वापसी की उम्मीद है, लेकिन फंडिंग का माहौल अस्थिर रहने की संभावना है। महंगाई को नियंत्रित करने और ग्रोथ को सहारा देने पर RBI का फोकस, साथ ही कॉर्पोरेट बॉन्ड मार्केट को बढ़ावा देने वाले सुधार महत्वपूर्ण होंगे। हालांकि, बैंक लोन की ओर वर्तमान मजबूत झुकाव और शेयर बाजार का कमजोर प्रदर्शन बताता है कि कुल कॉर्पोरेट फंडिंग ब्याज दर के रुझान, वैश्विक आर्थिक स्थिरता और जोखिम उठाने की निवेशकों की इच्छा से आकार लेती रहेगी।
