STT में बढ़ोतरी: F&O ट्रेडिंग पर असर
वित्त मंत्रालय ने 1 अप्रैल 2026 से लागू होने वाले नए नियमों का ऐलान किया है। इसके तहत, फ्यूचर कॉन्ट्रैक्ट्स (futures contracts) पर STT को 0.02% से बढ़ाकर 0.05% कर दिया गया है, जो कि 150% की भारी बढ़ोतरी है। वहीं, ऑप्शन कॉन्ट्रैक्ट्स (options contracts) पर STT को प्रीमियम और एक्सरसाइज दोनों पर 0.1% और 0.125% से बढ़ाकर 0.15% कर दिया गया है।
सरकार का कहना है कि इस फैसले का मुख्य मक़सद डेरिवेटिव्स मार्केट में ज़रूरत से ज़्यादा सट्टेबाजी को रोकना और सिस्टमैटिक रिस्क (systemic risk) को कम करना है। यह भी बताया गया है कि 90% से ज़्यादा रिटेल निवेशक F&O सेगमेंट में नुकसान उठाते हैं, ऐसे में यह एक 'कोर्स करेक्शन' (course correction) है।
इस बढ़ोतरी का सीधा असर हर ट्रेडर की बाइंग और सेलिंग कॉस्ट (buying/selling cost) पर पड़ेगा, खासकर उन एक्टिव ट्रेडर्स (active traders) और इंट्राडे पार्टिसिपेंट्स (intraday participants) पर जो हाई-फ्रीक्वेंसी स्ट्रेटेजी (high-frequency strategies) का इस्तेमाल करते हैं। उदाहरण के लिए, ₹1 लाख के फ्यूचर ट्रेड पर अब ₹20 का STT लगेगा, जो पहले ₹12.50 था। इसी तरह, ₹10,000 के ऑप्शन कॉन्ट्रैक्ट पर ₹10 STT देना होगा, जबकि पहले यह ₹6.25 था।
बाज़ार की तीखी प्रतिक्रिया
बजट के ऐलान के तुरंत बाद बाज़ार में तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिली। बेंचमार्क इंडेक्स Sensex और Nifty 50 में 2.9% तक की गिरावट दर्ज की गई। कैपिटल मार्केट्स, डिफेंस और PSU बैंकिंग सेक्टर सबसे ज़्यादा प्रभावित हुए। ब्रोकरेज फर्मों जैसे BSE, Angel One और Groww के शेयरों में 13.5% तक की भारी गिरावट आई, क्योंकि निवेशकों को ट्रेडिंग वॉल्यूम (trading volumes) में कमी की आशंका है।
जानकारों की मिली-जुली राय
बाज़ार के जानकारों की राय बंटी हुई है। कुछ दिग्गजों, जैसे शंकर शर्मा, ने इसे सट्टेबाजी रोकने के लिए ज़रूरी कदम बताया है। वहीं, कई एनालिस्ट्स (analysts) का मानना है कि इससे F&O वॉल्यूम और ब्रोकिंग फर्मों के मुनाफे पर अल्पकालिक दबाव रहेगा। TrustLine Holdings के CEO, N. ArunaGiri, ने बाज़ार की प्रतिक्रिया को 'नी-जर्क' (knee-jerk) बताया है। Avisa Wealth Creators के CIO, आदित्य अग्रवाल, ने कहा है कि बजट के अन्य सकारात्मक कदम, जैसे कि बायबैक टैक्सेशन (buyback taxation) का सरलीकरण और मैन्युफैक्चरिंग पर जोर, लंबी अवधि में निवेशकों का भरोसा बढ़ा सकते हैं।
लंबी अवधि की रणनीति
सरकार का इरादा डेरिवेटिव्स में भागीदारी को संयमित और कम सट्टा-आधारित बनाना है। हालांकि, वास्तविक हेजिंग (hedging) के सौदों पर भी लागत बढ़ जाएगी। विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPIs) की भागीदारी पर भी इसका मामूली असर पड़ सकता है। इन चिंताओं के बावजूद, कुछ का मानना है कि प्रारंभिक अस्थिरता (volatility) के बाद शेयर बाज़ार ज़्यादा नुकसान से बच सकता है। फरवरी 2026 के अंत तक Nifty 50 का P/E रेश्यो लगभग 22.1 था, और NSE पर लिस्टेड कंपनियों का कुल मार्केट कैप (market capitalization) नवंबर 2025 तक करीब ₹474.34 लाख करोड़ था। कुल मिलाकर, STT की बढ़ोतरी से कुछ मुश्किलें ज़रूर हैं, लेकिन बजट का मैन्युफैक्चरिंग और क्षमता निर्माण पर फोकस लंबी अवधि में स्वस्थ बाज़ार की नींव रख सकता है।