बजट का दोहरा असर: कहीं महंगाई का डर, तो कहीं डिजिटल को बढ़ावा
यह दोहरा प्रभाव ही वो मुख्य वजह है जो यह तय करेगा कि आने वाले समय में फाइनेंशियल सेक्टर (Financial Sector) कैसे आगे बढ़ेगा। जहाँ एक तरफ कर्ज की लागत बढ़ने का खतरा मंडरा रहा है, वहीं दूसरी तरफ पूंजी के रणनीतिक निवेश और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर (Digital Infrastructure) को सपोर्ट से विकास और एफिशिएंसी (Efficiency) में बढ़ोतरी के मौके भी पैदा होंगे।
बॉन्ड यील्ड्स का दबाव बनाम डिजिटल पेमेंट की तेज़ रफ़्तार
फाइनेंशियल ईयर 2026-27 के लिए ₹17.2 लाख करोड़ की ग्रॉस मार्केट बोर्रोइंग (Gross Market Borrowings) का अनुमान, बॉन्ड यील्ड्स पर लगातार दबाव बनाए रखेगा। ऐसे माहौल में सरकारी सिक्योरिटीज (Government Securities) में बड़ा निवेश रखने वाले बैंकों के ट्रेजरी ऑपरेशंस (Treasury Operations) के लिए मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं, जिससे वैल्यूएशन पर असर पड़ सकता है। नॉन-बैंक फाइनेंस कंपनियों (NBFCs) के लिए भी फंडिंग कॉस्ट (Funding Costs) बढ़ने की उम्मीद है।
इसके ठीक उलट, डिजिटल पेमेंट इकोसिस्टम (Digital Payments Ecosystem) को इस बजट में बड़ा सहारा मिला है। फाइनेंशियल ईयर 27 के लिए UPI इंसेंटिव के तहत ₹2,000 करोड़ का आवंटन किया गया है, जबकि फाइनेंशियल ईयर 26 के लिए संशोधित अनुमान ₹2,196 करोड़ है। यह फाइनेंशियल ईयर 26 के शुरुआती बजट ₹437 करोड़ से काफी बड़ी बढ़ोतरी है। इस खबर से पेमेंट कंपनियों के सेंटीमेंट (Sentiment) को तुरंत बल मिला, Paytm के शेयर 1.4% चढ़े और Mobikwik ने 4% की बढ़त दर्ज की (1 फरवरी, 2026)। हालांकि, इंडस्ट्री बॉडीज (Industry Bodies) का मानना है कि जीरो मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) वाले ट्रांजैक्शन (Transactions) के स्केल को देखते हुए यह इंसेंटिव पूल शायद पर्याप्त न हो, जिससे भविष्य में ग्रोथ के लिए फंडिंग की कमी हो सकती है।
बैंकिंग सेक्टर में सुधार और इंफ्रास्ट्रक्चर को धक्का
बैंकिंग सेक्टर की मौजूदा मजबूती, जिसमें मज़बूत बैलेंस शीट (Balance Sheets) और हाई प्रॉफिटेबिलिटी (High Profitability) शामिल है, को देखते हुए सरकार ने "High-Level Committee on Banking for Viksit Bharat" का गठन प्रस्तावित किया है। यह कमेटी रिफॉर्म-लेड ग्रोथ (Reform-Led Growth) के अगले चरण की योजना तैयार करेगी, जिसमें पब्लिक सेक्टर बैंकों (Public Sector Banks) के बीच कंसॉलिडेशन (Consolidation) के विकल्प भी शामिल हो सकते हैं। इसके साथ ही, इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट (Infrastructure Development) को गति देने के लिए एक इंफ्रास्ट्रक्चर रिस्क गारंटी फंड (Infrastructure Risk Guarantee Fund) बनाया जाएगा। यह फंड कंस्ट्रक्शन फेज (Construction Phase) के दौरान लेंडर्स (Lenders) को आंशिक गारंटी देगा, जिसका मकसद डेवलपर्स के जोखिम को कम करना और लंबे समय चलने वाले प्रोजेक्ट्स में प्राइवेट सेक्टर की भागीदारी को प्रोत्साहित करना है।
MSME और SME को सशक्त बनाने की पहल
माइक्रो, स्मॉल और मीडियम एंटरप्राइजेज (MSMEs) पर फोकस बना हुआ है। "चैंपियन SMEs" को बढ़ावा देने के लिए ₹10,000 करोड़ का SME ग्रोथ फंड (SME Growth Fund) घोषित किया गया है। इसके अलावा, माइक्रो एंटरप्राइजेज के लिए सेल्फ-रिलायंट इंडिया फंड (Self-Reliant India Fund) में ₹2,000 करोड़ और डाले जाएंगे। MSME की लिक्विडिटी (Liquidity) को बेहतर बनाने के उपायों में सेंट्रल पब्लिक सेक्टर एंटरप्राइजेज (CPSEs) के लिए ट्रेड रिसीवेबल्स डिस्काउंटिंग सिस्टम (TReDS) को अनिवार्य करना, गवर्नमेंट ई-मार्केटप्लेस (GeM) को TReDS से जोड़ना, और CGTMSE के जरिए क्रेडिट गारंटी (Credit Guarantees) का विस्तार करना शामिल है। इन पहलों से Karur Vysya Bank, City Union Bank, Federal Bank जैसे SME-फोक्स्ड लेंडर्स (Lenders) और Cholamandalam Investment, Bajaj Finance जैसी NBFCs को फायदा होने की उम्मीद है।
कॉर्पोरेट स्ट्रक्चरिंग और मार्केट की चाल
बजट में पब्लिक सेक्टर NBFCs के स्ट्रक्चरिंग (Restructuring) के संकेत भी मिले हैं, जिसमें पावर फाइनेंस कॉर्पोरेशन (PFC) और रूरल इलेक्ट्रिफिकेशन कॉर्पोरेशन (REC) की समीक्षा की जाएगी। इस कदम से ऑपरेशंस (Operations) सुव्यवस्थित हो सकते हैं और क्रेडिट डिलीवरी (Credit Delivery) बेहतर हो सकती है। 1 फरवरी, 2026 तक REC का शेयर प्राइस लगभग ₹359.85 पर था, जिसका P/E रेशियो (P/E Ratio) करीब 5.56 और मार्केट कैपिटलाइजेशन (Market Capitalization) लगभग ₹95,942 करोड़ था। Cholamandalam Investment and Finance Company, जिसकी कीमत करीब ₹1,579.50 थी, के शेयर में उसी दिन 1.95% की गिरावट दर्ज की गई। PFC ने फाइनेंशियल ईयर 25 में अब तक का सबसे बड़ा सालाना मुनाफा ₹14,367 करोड़ दर्ज किया है। मध्यम अवधि में, बॉन्ड मार्केट्स (Bond Markets) को गहरा करने के व्यापक प्रयास कॉर्पोरेट बॉरोअर्स (Corporate Borrowers) को पारंपरिक बैंक फाइनेंसिंग (Traditional Bank Financing) से दूर खींच सकते हैं।