सप्लाई के दबाव में बॉन्ड मार्केट
Mutual funds, जो ऐतिहासिक तौर पर भारतीय सरकारी बॉन्ड के सातवें सबसे बड़े होल्डर रहे हैं, ने जनवरी 2026 में ₹290 अरब की रिकॉर्ड नेट सेल्स (Net Sales) शुरू की। 2 फरवरी को लगभग ₹53 अरब की और बिकवाली दर्ज की गई। बॉन्ड मार्केट में सप्लाई का दबाव बढ़ने के कारण यह बिकवाली जारी है। अनुमान है कि आने वाले फाइनेंशियल ईयर में केंद्र और राज्य सरकारों की ग्रॉस बॉरोइंग ₹30 लाख करोड़ से अधिक हो सकती है, जो पिछले साल के मुकाबले 10% से ज्यादा बढ़त का अनुमान है। इतने बड़े वॉल्यूम से मौजूदा बॉन्ड की वैल्यूएशन पर दबाव बनता है। ऐतिहासिक तौर पर, ऊंचे उधार के स्तर अक्सर बॉन्ड यील्ड में बढ़त का संकेत देते हैं; बजट आने के ठीक बाद भारत के बेंचमार्क 10-साल के बॉन्ड यील्ड में लगभग 7 बेसिस पॉइंट्स की बढ़ोतरी देखी गई। यह प्रतिक्रिया ऐसे समय में हुई है जब व्यापारिक विकास (trade developments) से बाजार में कुछ उम्मीद जगी थी, लेकिन बॉन्ड सप्लाई का दबाव उन पर भारी पड़ रहा है।
कॉर्पोरेट और स्टेट डेट की ओर फंड्स का झुकाव
सरकारी बॉन्ड सप्लाई की इस चुनौती के जवाब में, फंड मैनेजर अब ऐसे इंस्ट्रूमेंट्स की ओर बढ़ रहे हैं जो बेहतर रिस्क-रिवॉर्ड प्रोफाइल पेश करते हैं। फंड्स ने 'मार्क-टू-मार्केट' (Mark-to-Market) कैपिटल गेन की स्ट्रेटेजी से हटकर 'एक्यूरल-बेस्ड' (Accrual-based) इनकम जनरेशन पर फोकस करना शुरू कर दिया है। इसके चलते, फंड्स अब कॉर्पोरेट बॉन्ड्स, खासकर 2 से 4 साल की मैच्योरिटी वाले, साथ ही बैंकों द्वारा जारी डेट और ज्यादा यील्ड वाले राज्य सरकारों के बॉन्ड्स में निवेश बढ़ा रहे हैं। फंड मैनेजर्स का मानना है कि कॉर्पोरेट बॉन्ड सेगमेंट में वैल्यू अभी भी आकर्षक है। यह रणनीतिक बदलाव इस अस्थिर डेट मार्केट में स्थिरता और स्थिर आय की ओर इशारा करता है।
RBI की भूमिका और यील्ड की संवेदनशीलता
मार्केट में मौजूद जानकारों का मानना है कि RBI (Reserve Bank of India) द्वारा बड़ी मात्रा में लिक्विडिटी (Liquidity) डालने से ही इस मौजूदा स्थिति को बदला जा सकता है। हालांकि, नज़दीकी भविष्य में ब्याज दरों में कटौती की उम्मीद नहीं है, लेकिन मार्केट पार्टिसिपेंट्स RBI से लिक्विडिटी मैनेजमेंट के नए उपायों पर पैनी नज़र रखे हुए हैं। रेटिंग एजेंसीज जैसे Moody's और S&P ने भारत की सॉवरेन क्रेडिट रेटिंग पर स्टेबल आउटलुक बनाए रखा है, लेकिन वे लगातार फिस्कल डेफिसिट (Fiscal Deficit) और ऊंचे उधार की जरूरतों को चिंता के मुख्य क्षेत्रों के रूप में इंगित करते रहे हैं। भारत के सॉवरेन डेट मार्केट का बड़ा आकार, जो खरबों रुपए के आउटस्टैंडिंग डेट में मापा जाता है, इसे सेंट्रल बैंक के एक्शन और बड़े पैमाने पर इश्यूज़, दोनों के प्रति संवेदनशील बनाता है। RBI का लिक्विडिटी मैनेजमेंट का रोल अहम बना हुआ है, क्योंकि वह महंगाई को कंट्रोल करने और पर्याप्त क्रेडिट फ्लो सुनिश्चित करने के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रहा है, ताकि यील्ड पर पड़ने वाले दबाव को और न बढ़ाया जा सके।