India Bonds पर दबाव: रिकॉर्ड सरकारी कर्ज और RBI की लिक्विडिटी पर अनिश्चितता से बढ़ी चिंता!

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AuthorNeha Patil|Published at:
India Bonds पर दबाव: रिकॉर्ड सरकारी कर्ज और RBI की लिक्विडिटी पर अनिश्चितता से बढ़ी चिंता!
Overview

इंडियन सरकारी बॉन्ड्स (Government Bonds) पर बिकवाली का दबाव और बढ़ने वाला है। राज्यों की ओर से इस फाइनेंशियल ईयर की सबसे बड़ी **₹486.15 अरब** (लगभग **$5.37 अरब**) की कर्जदारी (Debt Issuance) आने वाली है। यह भारी सप्लाई, रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) की ओर से लिक्विडिटी (Liquidity) बढ़ाने के स्पष्ट उपायों की कमी के साथ मिलकर, बॉन्ड यील्ड्स (Bond Yields) पर दबाव बना रही है।

भारी सप्लाई और RBI की खामोशी: इंडिया बॉन्ड्स पर बढ़ता दबाव

भारत के सरकारी बॉन्ड मार्केट में बिकवाली का और जोर देखने को मिल सकता है। इसकी वजह है राज्यों द्वारा भारी मात्रा में कर्ज जुटाने की तैयारी। रिपोर्ट्स के अनुसार, राज्य मंगलवार को ₹486.15 अरब (लगभग $5.37 अरब) के बॉन्ड बेचकर पैसा जुटाएंगे। यह इस फाइनेंशियल ईयर में अब तक की सबसे बड़ी राज्य-स्तरीय कर्जदारी (Debt Issuance) होगी। यह सप्लाई का भारी झटका (Supply Shock) ऐसे समय आ रहा है जब रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) ने लिक्विडिटी को लेकर कोई बड़े स्पष्ट उपाय नहीं किए हैं, जिससे बाजार की उम्मीदें कमजोर पड़ी हैं।

यील्ड्स में तेजी का अनुमान, RBI की पॉलिसी और मार्केट की उम्मीदें

बाजार की नजरें अब बेंचमार्क 6.48% 2035 बॉन्ड पर हैं, जिसकी यील्ड शुक्रवार को 6.7363% पर बंद हुई थी। सोमवार को यह 6.73% से 6.80% के दायरे में ट्रेड कर सकती है। राज्यों का यह भारी-भरकम कर्ज, उनके लगातार वित्तीय जरूरतों को दर्शाता है। इस दबाव को RBI के हालिया फैसले ने और बढ़ाया है, जिसमें उसने प्रमुख रेपो रेट (Repo Rate) को 5.25% पर बरकरार रखा है। RBI का यह फैसला देश के मजबूत आर्थिक विकास (Economic Growth) के अनुमानों (7.4% FY2025-26 के लिए) पर आधारित है। हालांकि, ट्रेडर्स को जिस तरह के ओपन मार्केट ऑपरेशन (OMO) या अन्य लिक्विडिटी बढ़ाने वाले उपायों की उम्मीद थी, उनकी अनुपस्थिति में यील्ड्स में तुरंत तेजी देखने को मिली है। RBI ने सिस्टम लिक्विडिटी को औसतन ₹70,000 करोड़ के सरप्लस में बनाए रखा है और पहले OMOs भी किए हैं, लेकिन बाजार को लगता है कि जैसे-जैसे कर्ज की जरूरतें बढ़ रही हैं, RBI का शिकंजा कस रहा है।

लिक्विडिटी की जद्दोजहद और वित्तीय हकीकतें

बॉन्ड यील्ड्स पर यह दबाव सिर्फ सप्लाई की वजह से नहीं है, बल्कि डिमांड-साइड की दिक्कतें भी इसमें शामिल हैं। केंद्र सरकार का FY2026-27 के लिए ग्रॉस मार्केट बॉरोइंग ₹17.2 लाख करोड़ रहने का अनुमान है, जबकि नेट बॉरोइंग ₹11.7 लाख करोड़ होगी। यह दिखाता है कि सरकार अपने 4.3% GDP के राजकोषीय घाटे (Fiscal Deficit) को पूरा करने के लिए कर्ज पर कितनी निर्भर है। इसी के साथ, बैंकिंग सिस्टम एक और बड़ी चुनौती का सामना कर रहा है - क्रेडिट (Credit) और डिपाजिट (Deposit) ग्रोथ के बीच बढ़ता अंतर। क्रेडिट एक्सपेंशन जहां लगभग 12% चल रहा है, वहीं डिपाजिट ग्रोथ करीब 10% है। इससे क्रेडिट-डिपाजिट रेशियो एक दशक के उच्च स्तर 82.17% पर पहुंच गया है। इस असंतुलन के कारण बैंकों को महंगी बल्क डिपाजिट पर ज्यादा निर्भर रहना पड़ रहा है, जो उनके नेट इंटरेस्ट मार्जिन (Net Interest Margin) को प्रभावित कर सकता है, भले ही अभी वे अच्छा मुनाफा कमा रहे हों। ऐतिहासिक रूप से, बड़े कर्ज इश्यू और टाइट लिक्विडिटी वाले समय में यील्ड्स में तेजी देखी गई है, और मौजूदा 6.71% के आसपास की 10-साल की यील्ड इन्हीं चिंताओं को दर्शाती है। वैश्विक बॉन्ड यील्ड्स का बढ़ना भी भारतीय डेट (Debt) पर ऊपर की ओर दबाव बना रहा है।

⚠️ जोखिमों का विश्लेषण: बियर केस

यह भारी सरकारी कर्ज, भले ही राजकोषीय नीति और पूंजीगत व्यय (Capital Expenditure) को सहारा दे, लेकिन प्राइवेट सेक्टर के निवेश को 'क्राउड-आउट' (Crowd-out) करने और व्यवसायों के लिए फाइनेंसिंग लागत (Financing Costs) बढ़ाने का जोखिम पैदा करता है। RBI का दरों को स्थिर रखने का फैसला, जो कि फरवरी 2025 से 125 बेसिस पॉइंट्स की राहत के बावजूद लिया गया है, यह संकेत देता है कि नीति निर्माता तत्काल यील्ड में कमी के बजाय महंगाई नियंत्रण (Inflation Control) और वित्तीय स्थिरता (Financial Stability) को प्राथमिकता दे रहे हैं। खासकर जब चौथी तिमाही FY2025-26 के लिए महंगाई 3.2% रहने का अनुमान है। रेट कट्स का धीमा असर (Lagged Transmission) और डिपाजिट की लगातार कमी का मतलब है कि बैंकों को क्रेडिट की मांग को पूरा करने में दिक्कत हो सकती है, जिससे आर्थिक गतिविधि धीमी हो सकती है या उधार लेने की लागत मॉनेटरी पॉलिसी के दायरे से बाहर बढ़ सकती है। महंगी बल्क डिपाजिट पर निर्भरता, भले ही लिक्विडिटी बढ़ाए, समय के साथ बैंक की प्रॉफिटेबिलिटी को भी कम कर सकती है, भले ही इस फाइनेंशियल ईयर में सरकारी बैंकों के रिकॉर्ड मुनाफे की उम्मीद है। बाजार की प्रतिक्रिया, लिक्विडिटी सपोर्ट के सीधे उपायों की कमी पर, यह दर्शाती है कि भारी कर्ज को सोखने के लिए सीधे हस्तक्षेप की दरकार है। अगर ऐसा नहीं हुआ तो यील्ड्स में और ज्यादा अस्थिरता देखने को मिल सकती है।

आगे का रास्ता: विश्लेषकों की राय

विश्लेषकों का मानना ​​है कि बॉन्ड यील्ड्स लिक्विडिटी की स्थिति, राजकोषीय विकासों और FY2027 के लिए सरकार के कर्ज कैलेंडर से प्रभावित होती रहेंगी। ICRA का अनुमान है कि FY2027 के यूनियन बजट (Union Budget) की प्रस्तुति तक 10-साल की G-Sec यील्ड 6.6%-6.75% के दायरे में ट्रेड करेगी। RBI ने आर्थिक जरूरतों के लिए पर्याप्त फंड सुनिश्चित करने और नीति के सुचारू प्रसारण (Smooth Policy Transmission) के लिए सक्रिय लिक्विडिटी प्रबंधन के प्रति अपनी प्रतिबद्धता जताई है। भविष्य की नीतिगत समायोजन आने वाले हफ्तों में महंगाई और GDP डेटा पर निर्भर करेगी।

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